Tin Sau Tis Kahavati Kahaniyan

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5000-903-1

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Pages:472


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राजस्थानी-हिन्दी कहावत-कोश: 8 सेठां! थांरी छुरी हेटै पड़गी, के डोफा आ तौ कलम है के म्हारै गळै तौ अब इज फिरी। सेठजी! आपकी छुरी नीचे गिर गयी कि बेवकूफ यह तो कलम है कि मेरे गले पर तो यही फिरी थी। इसकी सन्दर्भ-कथा छोटी होते हुए भी बहुत मार्मिक है। एक बनिया बगल में बही दबाये और कान में कलम खोंसे हुए अपनी हाट पर जा रहा था। पीली पगड़ी। नीचे मूँछें। एक भुक्त-भोगी असामी उसके पीछे नंगे पाँव चल रहा था। फटी धोती और चिंदी-चिंदी मैले-कुचैले साफे के अलावा उसके शरीर पर कुछ भी बेकार कपड़ा नहीं था। सिर और अंग की लाज ढकना जरूरी था। अचानक किसी चीज के गिरने की हलकी-सी भनक उसके कानों में पड़ी। उसने अपनी नैतिक जिम्मेदारी का निबाह करते हुए सेठजी को आवाज देकर कहा, ‘सेठजी! आपकी छुरी नीचे गिर गयी।’ सेठ ने चौंककर पीछे देखा। आश्चर्य से दोहराया, ‘छुरी?मुझे छुरी से क्या वास्ता?’ तब निरीह असामी ने सहज भाव से इशारा करते हुए कहा, ‘यह पड़ी है, न?’ अब कहीं सेठ को उस गँवार की बेवकूफी नजर आयी। व्यंग्य में मुस्कराते कहा, ‘मूर्ख कहीं का, यह तो मेरी कलम है, कलम!’ मूर्ख असामी ने रुँधे गले से कहा, ‘लेकिन मेरे गले पर तो यही चली थी।’ सेठ ने कुछ भी जवाब नहीं देकर चुपचाप अपनी कलम उठाई, कान में खोंसी और खँखारकर अपनी राह पकड़ी। जाने कितनी अर्थच्छटाएँ इस कहावत में सन्निहित हैं। श्रेष्ठ वस्तु भी यदि बुरे काम में आये तो वह बुरी ही है। बोहरे की कलम भी किसी आततायी की तलवार से कम नहीं होती। शोषण करने के अपने-अपने हथियार होते हैं और अपने-अपने तरीके। और हर तरीके की अपनी-अपनी हिंò-बर्बरता होती है। (भूमिका से)

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