BILLU SHAKESPEAR : POST-BASTAR

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-564-1

Author:ANAMIKA

Pages:198


MRP : Rs. 395/-

Stock:In Stock

Rs. 395/-

Details

बिल्लू शेक्सपियर : पोस्ट - बस्तर

Additional Information

"विश्व की जितनी प्राचीन सभ्यताएँ हैं-भारत, चीन, यूनान, रोम, मिस्र, अरब और मेसोपोटामिया-वहाँ के लोग स्वाभाविक रूप से परतदार होते हैं। सदियों की अनुगूँजें उनकी भाषा में छन आती हैं-लोकाख्यान, मिथक, ऐतिहासिक उठा-पटक और अदला-बदली की कई कच्ची-पक्की दास्तानें एक तरफ़ तो दूसरी तरफ़ इंटरनेट-दीपित दुनिया की कई उड़नछू सूचनाएँ, अधूरे संवाद और अन्य ध्वनिम् या 'साउंड बाइट्स' ! नतीज़ा यह कि यहाँ का भाषिक अवचेतन तरह-तरह की अन्तर्ध्वनियों से खचाखच भरा रहता है! एक बिम्ब का आसरा लूँ तो समझिए यहाँ का भाषिक अवचेतन अलीबाबा की गुफ़ा ही हो जाता है! उसके सनातन अँधेरों में परतदार आदिम स्मृतियाँ और सतही अधुनातन प्रसंग रहस्यमय रत्नों की तरह अपना सतरंगा प्रकाश बिखेरते रहते हैं। ऐसे में खुल जा सिमसिम'। जैसा कोई कूट संकेत क्या हो, जो हमें कहीं भीतरी तहों। तक ले जाए, उन भीतरी तहों तक जिनका उद्दीपन एक। अच्छे ‘पाठक' को सच्चा 'द्रष्टा' बना देता। है-आस-पास बिखरी बिख़री विडम्बनाओं से अपने अंतस के सच्चे सम्बन्ध का द्रष्टा। उपनिवेश रह चुकी प्राचीन सभ्यताओं में अँगरेज़ी साहित्य का शिक्षक हमेशा एक अटपटा प्राणी गिना जाता रहा है। 'न ययौ न तस्थौ ! लेकिन उसके अनुभव में कई ऐसी विसंगतियाँ भी आती हैं जिनका साक्ष्य जरूरी है! आये दिन वह कक्षा में देखता है कि अलग-अलग नैतिक भूगोलों या कालखण्डों में रची गयी कालजयी रचनाओं का हार्दिक पारायण अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों से आये विद्यार्थी जब करते हैं, विदेशी भाषा रोड़ा अटकाती है, भीतरी गुफ़ाओं का मुँह आधा खुलता है, आधा नहीं खुलता। फिर भी दो लोकों का दरस-परस कुछ तो होता ही है और अंतःपाठीय उड़ानों की एक दिलचस्प प्रक्रिया शुरू होती है! फिर से एक बिम्ब का आश्रय लूँ तो पूरी पाठ-प्रक्रिया में तीन बुलावै तेरह आवै' की स्थिति घिर आती है। एक बिम्ब पचपन और बिम्बों, सांस्कृतिक पर्यायों और आदिम स्मृतियों को न्योता दे-देकर बुला लाता है और सब मिलकर लगते हैं मन में ही पकड़म-पकड़ाई खेलने। इतना तो मानना ही होगा कि जनतंत्र गहराया है। आरक्षण का मांगलिक पक्ष दीखने लगा है। आज से एक दशक पहले तक अँगरेज़ी (ऑनर्स) की कक्षा में अंगरेज़ी माध्यम के स्कूलों से पढ़े हुए सम्भ्रान्त लड़के-लड़कियों का वर्चस्व रहता था। अब वंचित तबके के लड़के-लड़कियाँ भी विश्व-नागरिक बनने की तैयारी में अँगरेज़ी के माध्यम से विश्वसाहित्य पढ़ने आते हैं और कक्षा में सबसे सार्थक सवाल भी वही पूछते हैं! मुश्किल बस एक आती है कि उनकी संवेदना अँकवार लेने वाली 'अँगरेज़ी' उनके पास नहीं होती। मातृभाषा तो लहरदार लिखते और बोलते हैं पर विदेशी भाषा से उनकी अंतरंग दोस्ती का सही उपक्रम बचपन में कभी हुआ ही नहीं होता। उनके माता-पिता भौतिक कारणों से घर पर अतिरिक्त किताबें जुटा नहीं पाते, न पुस्तकालय जाने का चस्का ही लगा पाते हैं। शिक्षकों को भी जो अतिरिक्त श्रम इन पर करना चाहिए, वे। करते नहीं! नतीजा यह कि उनकी अँगरेज़ी इतनी। अगाध नहीं हो पाती कि सब तरह की अनुगूँजें सँभाल ले और एक ख़ला सी रह जाती है संवेदना और अभिव्यक्ति के बीच। बहुत सारे शिक्षकों ने अपने-अपने ढंग से इस विडम्बना से जूझने की कोशिश की होगी! इस उपन्यासिका के दो अँगरेज़ी शिक्षकों ने भी की और इस क्रम में उनका अपना जीवन किन विडम्बनाओं से घिरा और नयी पीढ़ी ने उन्हें इससे उबारने में क्या भूमिका अदा की-इसकी छोटी-सी झलक आगे के पृष्ठों में आपको मिलेगी। इसका नायक है मेरा अपना ही आदिवासी छात्र-विलियम किण्डो, विलियम शेक्सपियर, विलियम ब्लेक, विलियम वर्ड्स्वर्थ आदि से अपने नाम का साम्य जिसे अलग ढंग से स्पंदित रखता था! पृष्ठभूमि बस्तर की है जहाँ मान्यता टण्डन और उनके बालसखा आशिष मुखर्जी मिलकर वंचित तबकों के लिए 'कहानियों का एक स्कूल' चलाते हैं और एक नाट्यमण्डली भी। यहाँ हिन्दी में विश्व की कालजयी कृतियों पर आधारित समकालीन पटकथाएँ मंचित की जाती है कि बराबर का सांस्कृतिक संवाद कायम रहे...! "

About the writer

ANAMIKA

ANAMIKA राष्ट्रभाषा परिषद् पुरस्कार, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, गिरिजाकुमार माथुर पुरस्कार, ऋतुराज सम्मान, साहित्यकार सम्मान से शोभित अनामिका का जन्म 17 अगस्त, 1961, मुजफ्फरपुर, बिहार में हुआ । इन्होंने एम.ए., पीएच.डी.( अंग्रेजी), दिल्ली विश्वविद्यालय से प्राप्त की । तिनका तिनके पास (उपन्यास),कहती हैं औरतें (सम्पादित कविता संग्रह) प्रकाशित हैं । वर्तमान में रीडर,अंग्रेजी विभाग, सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ।

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