Augustya Katha

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-005-2

Author:NARENDRA KOHLI

Pages:87

MRP:Rs.199/-

Stock:In Stock

Rs.199/-

Details

​अगस्त्य-कथा

Additional Information

'अगस्त्य-कथा' नरेन्द्र कोहली के रामकथाघृत उपन्यास ‘अभ्युदय' के एक अंश की सामग्री पर आधृत नाटक है। रामकथा के अनुसार अगस्त्य ही वे ऋषि थे, जो राम के दण्डकवन में आने से पूर्व राक्षसों से सशस्त्र संघर्ष कर रहे थे और जिन्होंने राम को पंचवटी भेजा था, ताकि वे राक्षस सेनाओं के प्रत्यक्ष सम्पर्क में आयें और उनका नाश करें। इस नाटक में सारी कथा ऋषि अगस्त्य के जीवन के उस खण्ड की है, जिसमें अभी राम का प्रवेश नहीं हआ है। वह उस ऋषि की कथा है, जिन्होंने समाजविरोधी अमानवीय तत्त्वों से लड़ने तथा समाज-निर्माण के कार्य के लिए किसी राजशक्ति का मुख ताकने के स्थान पर स्वयं ही इन समस्याओं से जूझने की ठानी। अगस्त्य के नाम के साथ बहुत से चमत्कार जुड़े हुए हैं विंध्याचल को ऊँचा उठने से रोकना, सागर को पी जाना, इल्विल और वातापी नामक राक्षसों को खा कर पचा जाना इत्यादि। नरेन्द्र कोहली ने अपने उपन्यास में उनको समझने का प्रयत्न किया है। उन्होंने इसी कथा के माध्यम से व्यक्तिगत सुख और समाज के हित के द्वन्द्व को भी पहचाना है, जो किसी एक विशेष युग का तथ्य न होकर त्रिकाल में व्याप्त सत्य है। इस अंश की नाटकीयता के आविष्कार हैं ज़फर संजरी। उन्हें लगा कि उपन्यास के रूप में भी यह अंश सुन्दर और आकर्षक है, किन्तु उसकी आत्मा तो नाटक के रूप में ही अपना स्वरूप प्रकट कर सकती है। सिद्ध रंगकर्मी जफ़र संजरी की यह मान्यता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि कथा के मध्य में से जब नाटक जन्म लेता है तो दोनों विधाओं की ऊर्जा और क्षमता को सम्मिलित रूप से प्रकाशित करता है। इस नाटक की एक और विशेषता यह है कि इसमें रंग-सज्जा की कोई अपेक्षा नहीं है। इसका बिना किसी प्रकार की रंग-सज्जा के, पूर्ण सफलता और सुन्दरता से मंचन किया जा सकता है। हमें विश्वास है कि अपनी अगली प्रस्तुति के लिए इस देश की मिट्टी से उपजे, जनमानस में रचे-बसे, किसी सामयिक, सामाजिक, गम्भीर, फिर भी रोचक नाटक की खोज में व्यस्त कोई रंगकर्मी इस नाटक की उपेक्षा नहीं कर सकता।

About the writer

NARENDRA KOHLI

NARENDRA KOHLI नरेन्द्र कोहली का जन्म 6 जनवरी 1940, सियालकोट ( अब पाकिस्तान ) में हुआ । दिल्ली विश्वविद्यालय से 1963 में एम.ए. और 1970 में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की । शुरू में पीजीडीएवी कॉलेज में कार्यरत फिर 1965 से मोतीलाल नेहरू कॉलेज में । बचपन से ही लेखन की ओर रुझान और प्रकाशन किंतु नियमित रूप से 1960 से लेखन । 1995 में सेवानिवृत्त होने के बाद पूर्ण कालिक स्वतंत्र लेखन। कहानी¸ उपन्यास¸ नाटक और व्यंग्य सभी विधाओं में अभी तक उनकी लगभग सौ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनकी जैसी प्रयोगशीलता¸ विविधता और प्रखरता कहीं और देखने को नहीं मिलती। उन्होंने इतिहास और पुराण की कहानियों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखा है और बेहतरीन रचनाएँ लिखी हैं। महाभारत की कथा को अपने उपन्यास "महासमर" में समाहित किया है । सन 1988 में महासमर का प्रथम संस्करण 'बंधन' वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था । महासमर प्रकाशन के दो दशक पूरे होने पर इसका भव्य संस्करण नौ खण्डों में प्रकाशित किया है । प्रत्येक भाग महाभारत की घटनाओं की समुचित व्याख्या करता है। इससे पहले महासमर आठ खण्डों में ( बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध) था, इसके बाद वर्ष 2010 में भव्य संस्करण के अवसर पर महासमर आनुषंगिक (खंड-नौ) प्रकाशित हुआ । महासमर भव्य संस्करण के अंतर्गत ' नरेंद्र कोहली के उपन्यास (बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध,आनुषंगिक) प्रकाशित हैं । महासमर में 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' के बारे में वर्णन है, लेकिन स्त्री के त्याग को हमारा पुरुष समाज भूल जाता है।जरूरत है पौराणिक कहानियों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझा जाये। इसी महासमर के अंतर्गततीन उपन्यास 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' हैं जो स्त्री वैमर्शिक दृष्टिकोण से लिखे गये हैं ।

Books by NARENDRA KOHLI

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality