JANGAL KI HAKADARI : RAJNEETI AUR SANGHARSH

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-764-5

Author:KAMAL NAYAN CHOUBEY

Pages:442


MRP : Rs. 750/-

Stock:In Stock

Rs. 750/-

Details

जंगल की हक़दारी : राजनीति और संघर्ष

Additional Information

जंगल की ज़मीन पर आदिवासियों के अधिकार का मसला काफ़ी विवादित रहा है। संसाधनों से भरे होने के कारण विकास के नाम पर होने वाली हर गतिविधि के केंद्र में जंगल और उसके आस-पास बसे गाँव आ जाते हैं। इसी वज़ह से राज्य भी जंगलों पर अपना दावा करता है। आर्थिक उदारीकरण के बाद के दौर में तो ख़ास तौर पर विकास के नाम पर ये संसाधन न केवल निजी कम्पनियों के लिए खोले जा रहे हैं, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया में आदिवासियों की मर्जी की कोई परवाह नहीं की जा रही है। आदिवासी समुदायों की जीविका का मुख्य माधार जंगल है, लेकिन उनकी ज़िन्दगी पूरी तरह से वन-विभाग के अधिकारियों की मनमर्जी पर निर्भर हो चुकी है। ज़मीन का पट्टा न होने की स्थिति में इन्हें न केवल वन-अधिकारियों को घूस या नज़राना देना पड़ता है, बल्कि जंगल और वनोपज का इस्तेमाल करने के लिए भी उनकी इजाज़त लेनी पड़ती है। इन्हीं सब कारणों से आदिवासियों की स्थिति एक लोकतांत्रिक देश के अधिकारहीन नागरिकों की तरह हो गयी है, जिसके परिणामस्वरूप जंगल की ज़मीन और इसके संसाधनों के दोहन के ख़िलाफ़ स्थानीय समुदायों का प्रतिरोध बढ़ता जा रहा है। प्रस्तुत अध्ययन यह पता लगाने की कोशिश करता है कि आधुनिकता के विविध सकारात्मक या नकारात्मक आयामों का जंगल और इसके साथ जुड़े लोगों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है ? अर्थात् जनगणना, जंगल, अनुसूचित जनजाति, निजी सम्पत्ति, क़ानून का शासन जैसी श्रेणियों के निर्माण ने इनके जीवन में क्या बदलाव किये हैं? आदिवासी समुदायों की ज़िन्दगी के विभिन्न आयाम किस तरह जंगल से जुड़े हुए हैं? राज्य और इसकी प्रतिनिधि संस्था के रूप में वन-विभाग की कार्यप्रणाली और राज्य की दूसरी नीतियों का इनके जीवन पर कैसा प्रभाव पड़ा है ? औपनिवेशिक या उत्तर-औपनिवेशिक राज्य की नीतियों ने इन समुदायों को किस हद तक जंगल और इसके संसाधनों पर हक़ दिया है? क्या जंगल की ज़मीन या इसके आस-पास के क्षेत्रों में बसे समुदायों द्वारा 'अतिक्रमण' किया गया है? इस पूरे संदर्भ में वन अधिकार क़ानून किस रूप में समझा जा सकता है? क्या यह आदिवासियों को जंगल की ज़मीन और इसके संसाधनों पर हक़ देता है? क्या नया क़ानून वन्य जीवों के संरक्षण की मज़बूत व्यवस्था करता है ? लोकतांत्रिक समाज में क़ानूनों द्वारा हुए बदलाव किस रूप में देखे जा सकते हैं? इन्हें किस हद तक प्रगतिशील माना जा सकता है ? फ़ील्डअध्ययन की विधि अपना कर इस शोधप्रबंध में इन सभी पहलुओं की पड़ताल करते हुए क़ानून बनने की प्रक्रिया, उसके तर्को और क़ानून की सम्भावनाओं और सीमाओं का विश्लेषण किया गया है।

About the writer

KAMAL NAYAN CHOUBEY

KAMAL NAYAN CHOUBEY कमल नयन चौबे दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज में राजनीति विज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर। फ़िलहाल, दो वर्षों (2012-14) के लिए नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम ऐंड लाइब्रेरी में कनिष्ठ फ़ेलो के रूप में अनुसंधानरत।

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