BHRASHTACHAR VIRODH : VIBHRAM AUR YATHARTH

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-861-1

Author:PREM SINGH

Pages:200


MRP : Rs. 195/-

Stock:In Stock

Rs. 195/-

Details

भ्रष्टाचार विरोध : विभ्रम और यथार्थ

Additional Information

भारत जैसे जटिल समाज में साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता, जातिवाद और उनके गठजोड़ को परखने व उससे लड़ने की चुनौती बड़ी है। बड़े से बड़ा बुद्धिजीवी एक से लड़ते हुए दूसरे की मदद करने लगता है। इसीलिए तमाम साम्राज्यवाद-विरोधी या तो साम्प्रदायिकता की मदद लेते हैं या जातिवादी हो जाते हैं। दूसरी तरफ़ साम्प्रदायिकता, जातिवाद व पुरुषवाद से लड़ने वाले तमाम राजनीतिक समूह साम्राज्यवाद के इशारे पर काम करते हुए दिखते हैं। यह एक विचित्र शिकंजा है जिससे बहुत कम राजनेता और क्रान्तिकारी निकल पाते हैं। ऊपर से नवउदारवाद ने बाज़ार की चकाचौंध के माध्यम से ऐसा जाल रचा है कि बाज़ार का प्रचार करने वाले और उनसे लड़ने वाले दोनों के वित्तीय स्रोत एक ही जगह से निकलते हैं। अगर विश्व बैंक, आईएमएफ और उनके साथ जुड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ बाज़ारवाद को बढ़ावा देती हैं तो उनके विरोध में आन्दोलन कर रहे तमाम एनजीओ भी उन्हीं देशों और उन्हीं की संस्थाओं से आर्थिक मदद पाते हैं। यानी भारत जैसे विकासशील देश की जनता का पक्ष और विपक्ष लगभग एक ही तरह के मायाजाल में फंसा हुआ है। इन स्थितियों को समझना और उनके विश्लेषण के औज़ार को विकसित करने का काम मुख्यधारा से अलग खड़े होकर अपने को एक तरह से अलोकप्रियता के द्वीप पर कैद कर लेने जैसा है। प्रेम सिंह उन विरले लोगों में हैं जो इस तरह का जोख़िम उठाते हैं और अपने साथियों के बीच अलोकप्रिय होने के साथ तमाम समाजवादी, गाँधीवादी और आन्दोलनकारी समूहों में तोड़फोड़ करते हैं। - अरुण कुमार त्रिपाठी

About the writer

PREM SINGH

PREM SINGH डॉ. प्रेम सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शिक्षक हैं। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में तीन वर्ष (1991-1994) तक फेलो रहते हुए हिन्दी और बंगला उपन्यास में क्रान्ति के विचार का अध्ययन किया है। अध्ययन का एक भाग 'क्रान्ति का विचार और हिन्दी उपन्यास' (2000) भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान से प्रकाशित है। आलोचना एवं राजनीतिक विश्लेषण की अन्य प्रकाशित पुस्तकें हैं : 'अज्ञेय : चिन्तन और साहित्य' (1987), 'निर्मल वर्मा : सृजन और चिन्तन' (संपा.) (1989), 'रंग-प्रक्रिया के विविध आयाम' (संपा.) (2007), 'साने गुरुजी साहित्य संकलन' (2008), ‘मधु लिमये : जीवन और राजनीति' (संपा.) (1996), 'कट्टरता जीतेगी या उदारता' (2004), 'उदारीकरण की तानाशाही' (2006)। इसके अलावा 'गुजरात के सबक' (2004, द्वितीय संस्करण 2009), 'जानिए योग्य प्रधानमन्त्री को' (2004), 'मिलिए हुकम के गुलाम से' (2009), 'संविधान पर भारी साम्प्रदायिकता' (2013) पुस्तिकाएँ प्रकाशित। दो कविता संग्रह ‘अभिशप्त जियो' (1982) और 'पीली धूप : पीले फूल' (1992) और एक कहानी संग्रह 'काँपते दस्तावेज़' (1982) भी प्रकाशित हैं। छात्र जीवन से ही समाजवादी आन्दोलन से जुड़े डॉ. प्रेम सिंह सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव हैं।

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