PATRAKARITA KI KHURDARI ZAMEEN

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5072-974-8

Author:Rakesh Tiwari

Pages:152


MRP : Rs. 350/-

Stock:In Stock

Rs. 350/-

Details

पत्रकारिता की खुरदरी ज़मीन

Additional Information

पिछले एक-डेढ़ दशक में पत्रकारिता बहुत तेज़ी से बदली है। बदलावों की शुरुआत भूमंडलीकरण की पहली खेप के साथ ही होने लगी थी। इन वर्षों में 'प्रेस' देखते-देखते 'मीडिया' हो गया। मीडिया धन्धे में तब्दील होने लगा और धन्धे के लिए या तो मनोरंजन करने लगा या सूचनात्मक और प्रचारात्मक ख़बरों को तरजीह देने लगा। ख़बर की भाषा और कंटेंट बदलते-बदलते आज वास्तविक ख़बर हाशिए पर जाती दिख रही है। पत्रकार और पत्रकारिता को जिनके साथ खड़ा दिखाई देना चाहिए, उनकी सुध लेना उसने लगभग बन्द कर दिया। लोकतंत्र का यह चौथा पाया एक तरह से शहरी मध्यवर्ग का कूड़ादान बन गया, क्योंकि ख़बर आबादी के उसी, तक़रीबन एक तिहाई, हिस्से का प्रतिनिधित्व करने लगी। इस तरह लोकतंत्र के प्रहरी की उसकी भूमिका गौण हो गयी। दुखद पहलू यह है कि इस दौरान मीडिया पर राजनीतिकों और कारपोरेट जगत के स्वार्थी गठजोड़ में सहयोगी होने के आरोप लगने लगे हैं। इस वजह से भी उसने अपनी विश्वसनीयता काफ़ी हद तक खोई है। इन्हीं तमाम हालात के मद्देनज़र पत्रकारिता से कुछ ज़रूरी चीजों का, जिनमें उसके सरोकार प्रमुख हैं, सिरे से गायब हो जाना इस पुस्तक की। चिन्ता के केन्द्र में है। पत्रकारों के रोज़मर्रा के। कामकाज पर विचार करते हुए इस बात पर भी गौर किया गया है कि इस पेशे में भूल-चूक कहाँ और। क्यों हो रही है। मरती हुई ख़बर को बचाने और पत्रकारिता की घटती विश्वसनीयता फिर से कायम करने को इस पुस्तक में मौजूदा दौर की प्रमुख चुनौती के रूप में देखा गया है।

About the writer

Rakesh Tiwari

Rakesh Tiwari उत्तराखंड के गरमपानी (नैनीताल) में जन्म। एक समय सारिका, धर्मयुग, रविवार, साप्ताहिक हिन्दुस्तान से लेकर तमाम पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों के प्रकाशन के साथ चर्चित। लम्बी खामोशी के बाद फिर से कथा-लेखन में सक्रिय और इधर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों से फिर चर्चा में। कुछेक कहानियों का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद। एक कहानी पर फिल्म बनी है और एक कहानी के नाट्य-रूपान्तरण के बाद कई शहरों में नाट्य प्रस्तुतियाँ। कुछ कहानियाँ अन्य लेखकों द्वारा सम्पादित संग्रहों में शामिल। व्यंग्य सहित साहित्य की दूसरी विधाओं के अलावा बाल साहित्य लेखन भी। शुरुआती दौर में रंगकर्म और पटकथा लेखन से भी नाता। छिटपुट तौर पर पत्राकारिता का अध्यापन और अनुवाद कार्य भी। पहला कहानी संग्रह ‘उसने भी देखा’ (1993) और एक बाल उपन्यास ‘तोता उड़’ प्रकाशित। एक उपन्यास और पत्रकारिता पर एक पुस्तक का प्रकाशन शीघ्र ही। लम्बे समय से पत्रकारिता में रहते हुए राजनीति, खेल, कला, फिल्म, पर्यावरण, जनान्दोलन और अन्य समसामयिक मुद्दों पर लेखन और रिपोर्टिंग। साहित्यिक-सांस्कृतिक रिपोर्टिंग को नया आयाम और नये तेवर देने वाले पत्राकार के रूप में विशिष्ट पहचान। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में घुसपैठ और ताकझाँक के विविध अनुभव। वर्तमान मं् इंडियन एक्सप्रेस समूह के दैनिक जनसत्ता में विशेष संवाददाता।

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality