BHARTIYA SAADHU, SANT AUR SANYASI JEENE KI EK RAAH YAH BHEE

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5229-004-8

Author:RAVI KAPOOR

Pages:192

MRP:Rs.450/-

Stock:In Stock

Rs.450/-

Details

विश्व में भारत एक आध्यात्मिक देश के रूप में प्रसिद्ध है और आध्यात्मिकता के साथ साधुओं और संन्यासियों का प्राचीन काल से गहरा रिश्ता बना हुआ है। यह पुस्तक साधु-संन्यासी की जिन्दगी से जुड़े तमाम पहलुओं की व्याख्या करती है और बताती है कि ये लोग अपनी जीवनचर्या में आध्यात्मिक परम्परा का पालन करते हुए किस तरह अपने शरीर और मन को साधते हैं। योग का ज्ञान और योगाभ्यास इस परम्परा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। योग के माध्यम से जीवन में स्वास्थ्य और सुख-सन्तुष्टि पाने के लिए तरह-तरह के दावे किये जाते हैं। अपने तरह के पहले और अनोखे शोध में एक साइकियाट्रिस्ट द्वारा वैज्ञानिक ढंग से योग का स्वयं अनुभव कर उसके परिणामों को यह पुस्तक रोचक ढंग से प्रस्तुत करती है। इसके साथ ही पुस्तक में हिमालय क्षेत्र में रहने वाले साधुओं और संन्यासियों का निकट से अध्ययन कर उनके जीवन की चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला गया है। इन सारे अनुभवों के आधार पर आज के जीवन में स्वास्थ्य के सन्दर्भ में उठने वाले तमाम सवालों का समाधान भी यह पुस्तक प्रस्तुत करती है। स्वास्थ्य के वैज्ञानिक अध्ययन की दृष्टि से ही नहीं आम पाठक की उत्सुकताओं के मद्देनजर भी यह एक उपयोगी पुस्तक है। यह भारतीय जीवन की चुनौतियों और योग एवं स्वास्थ्य को समझने के लिए प्रामाणिक ज्ञान व जानकारी उपलब्ध कराती है। आकर्षक शैली में प्रस्तुत एक पठनीय कृति!

Additional Information

अनुवादक परिचय गिरीश्वर मिश्र पुस्तक का अंग्रेजी से अनुवाद दिल्ली विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के वरिष्ठ प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र ने किया है। इस समय वे महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) के कुलपति हैं। मनोविज्ञान में अनेक पुस्तकों के लेखक और सम्पादक प्रो. मिश्र अस्मिता, संस्कृति और शिक्षा के प्रश्नों पर हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं में भी लिखते रहे हैं।

About the writer

RAVI KAPOOR

RAVI KAPOOR लेखक प्रोफेसर रवि कपूर, भारत में मानसिक स्वास्थ्य के प्रमुख केन्द्र निमहान्स, बेंगलुरु में साइकियाट्री के वरिष्ठ प्रोफेसर रहते हुए सामुदायिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अग्रणी शोधकर्ता के रूप में विख्यात रहे हैं। उनके असामयिक निधन के बाद डोरोथी बुग्लास और मालविका कपूर ने पुस्तक को सम्पादित किया।

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