Swami Vivekanand Ne Kaha

Format:Paper Back

ISBN:978-81-8214-047-9

Author:SWAMI VIVEKANAND

Pages:16

MRP:Rs.60/-

Stock:In Stock

Rs.60/-

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स्वामी विवेकानन्द ने कहा

Additional Information

भारत एक खोज 19वीं और 20वीं सदी की अवधि भारत में ज्ञानोदय की अवधि मानी जाती है। हज़ारों साल के भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास में कुछेक रूढ़ियाँ और कुरीतियाँ भी आ जुड़ी थीं, जिन्हें पुनरुत्थानवादी तत्व परम्परा का नाम देते थे। इसके अतिरिक्त भारत के पास वेद-उपनिषद, न्याय-दर्शन की जो समृद्ध सम्पदा थी वह मठों-मन्दिरों के अँधेरे कोनों में दबी पड़ी थी। धर्मों की कल्पना मानव-मात्र के कल्याण के लिए कभी की गयी थी, वह गलत व्याख्याओं के चलते सामाजिक विघटन की भूमिका अदा कर रहा था-मनुष्य-मनुष्य के बीच नफरत के बीज बो रहा था। पश्चिम से आयत्त नयी रोशनी वाली वैज्ञानिक शिक्षा पद्धति और सोच को अस्पृश्य भाव से देखा जाता था। ऐसे अन्धकारमय वातावरण में आधुनिक भारत के विद्वानों-विचारकों- राजनेताओं ने नये ज्ञान रूपी सूर्य का आह्वान किया और इस तरह हमारे राष्ट्र के जीवन में ज्ञानोदय हुआ। राजा राममोहन राय, विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राधाकृष्णन, गणेश शंकर विद्यार्थी, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया आदि मिटानों विचारकों-राजनेताओं की गणना भारतीय ज्ञानोदय की उन्हीं विभूतियों में होती है। इस पुस्तकमाला में किशोर एवं बाल पाठकों के लिए ज्ञानोदय के इन महापुरुषों के विचार उन्हीं के शब्दों में प्रस्तुत किये गये हैं। आशा है, किशोर पाठक, जिन पर आगे चलकर देश के विकास का दायित्व आना है, इससे लाभान्वित होंगे और अपना ज्ञानवर्धन करेंगे।

About the writer

SWAMI VIVEKANAND

SWAMI VIVEKANAND स्वामी विवेकानन्द जन्म 12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता (कोलकता) में हुआ। आपके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। सन्यास धारण करने से पहले आपका नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था व आप नरेन के नाम से भी जाने जाते थे। आपका परिवार धनी, कुलीन और उदारता व विद्वता के लिए विख्यात था । विश्वनाथ दत्त कोलकाता उच्च न्यायालय में अटॅार्नी-एट-लॉ (Attorney-at-law) थे व कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकालत करते थे। वे एक विचारक, अति उदार, गरीबों के प्रति सहानुभूति रखने वाले, धार्मिक व सामाजिक विषयों में व्यवहारिक और रचनात्मक दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति थे । भुवनेश्वरी देवी सरल व अत्यंत धार्मिक महिला थीं । आपके पिता पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेन्द्र को भी अँग्रेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढर्रे पर चलाना चाहते थे। नरेन्द्र की बुद्धि बचपन से तीव्र थी और परमात्मा में व अध्यात्म में ध्यान था। इस हेतु आप पहले ‘ब्रह्म समाज’ में गये किन्तु वहाँ आपके चित्त संतुष्ट न हुआ। इस बीच आपने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी.ए उत्तीर्ण कर ली और कानून की परीक्षा की तैयारी करने लगे। इसी समय में आप अपने धार्मिक व अध्यात्मिक संशयों की निवारण हेतु अनेक लोगों से मिले लेकिन कहीं भी आपकी शंकाओं का समाधान न मिला। एक दिन आपके एक संबंधी आपको रामकृष्ण परमहंस के पास ले गये। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने नरेन्द्रदत्त को देखते ही पूछा, "क्या तुम धर्म विषयक कुछ भजन गा सकते हो?" नरेन्द्रदत्त ने कहा, "हाँ, गा सकता हूँ।" फिर नरेन ने दो-तीन भजन अपने मधुर स्वरों में गाए। आपके भजन से स्वामी परमहंस अत्यंत प्रसन्न हुए। तभी से नरेन्द्रदत्त स्वामी परमहंस का सत्संग करने लगे और उनके शिष्य बन गए। अब आप वेदान्त मत के दृढ़ अनुयायी बन गए थे। 16 अगस्त 1886 को स्वामी परमहंस परलोक सिधार गये। 1887 से 1892 के बीच स्वामी विवेकानन्द अज्ञातवास में एकान्तवास में साधनारत रहने के बाद भारत-भ्रमण पर रहे। आप वेदान्त और योग को पश्चिम संस्कृति में प्रचलित करने के लिए महत्वपूर्ण योगदान देना चाहते थे। स्वामी विवेकानंद वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। आपने अमेरिका स्थित शिकागो में 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द के कारण ही पहुँचा। आपने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की जो आज भी अपना काम कर रहा है। आप स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य व प्रतिभावान शिष्य थे। आपको अमरीका में दिए गए अपने भाषण की शुरुआत "मेरे अमेरिकी भाइयों एवं बहनों" के लिए जाना जाता है । निधन: 4 जुलाई, 1902 को आप परलोक सिधार गये।

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