Aatmakatha Ki Sanskriti

Format:Hard Bound

ISBN:81-8143-055-7

Author:PANKAJ CHATURVEDI

Pages:158


MRP : Rs. 300/-

Stock:In Stock

Rs. 300/-

Details

आत्मकथा की संस्कृति

Additional Information

हिन्दी में आत्मकथाओं की तो अच्छी-खासी संख्या है लेकिन आत्मकथाओं के शिल्प और संरचना पर पुस्तकों का अकाल-सा है। बहुत कम ऐसी पुस्तकें हैं जिनमें आत्मकथाओं के स्वरूप का ठीक-ठाक विश्लेषण मिलता है और विवेच्य विषय पर लेखक की मौलिक दृष्टि का पता चलता है। इस अर्थ में युवा आलोचक पंकज चतुर्वेदी की पुस्तक 'आत्मकथा की संस्कृति' एक अपवाद की तरह है जिसमें आत्मकथा की संस्कृति के विवेचन के साथ-साथ हिन्दी में आत्मकथाओं की क्षीणकाय परम्परा का भी जायजा लिया गया है। बाद के तीन अध्यायों में उग्र की आत्मकथा 'अपनी ख़बर' में निहित जीवन, भाषा और शिल्प का मूल्यांकन किया गया है। यों इस पुस्तक में आलोचना के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पहलुओं का एक अच्छा समन्वय हुआ है। यह किताब हिन्दी समाज में आत्मकथा-सम्बन्धी बहस के समारम्भ की एक कोशिश है। शायद इस विधा के दरवाज़े पर आलोचना की पहली दस्तक!

About the writer

PANKAJ CHATURVEDI

PANKAJ CHATURVEDI पंकज चतुर्वेदी का जन्म 24 अगस्त, 1971 को इटावा (शहर) (उ.प्र.) में हुआ। यों पैतृक गाँव तिश्ती, उत्तर प्रदेश के कानपुर-देहात जनपद में है। इटावा और कानपुर के गाँवों-कस्बों में आरम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद सातवीं कक्षा से उ.प्र. सैनिक स्कूल, लखनऊ के छात्र हुए। वहाँ से 1989 में आई.एस. सी. और फिर लखनऊ विश्वविद्यालय से 1992 में बी.ए.। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली से 1994 में एम. ए. (हिन्दी) में प्रथम स्थान हासिल किया और 1998 में एम. फिल. में भी। वहीं से 2007 में पीएच.डी.। कविता, संस्कृति और शिक्षा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अन्यान्य समीक्षात्मक निबन्ध, अंग्रेज़ी से हिन्दी में सृजनात्मक एवं आलोचनात्मक लेखन के कुछ अनुवाद और अनेक साक्षात्कार प्रकाशित। कविता के लिए वर्ष 1994 के भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार और आलोचना के लिए 2003 के देवीशंकर अवस्थी सम्मान एवं उ.प्र. हिन्दी संस्थान के रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार से सम्मानित। प्रकाशित कृतियाँ : एक सम्पूर्णता के लिए (1998), एक ही चेहरा (2006)-कविता-संग्रह; आत्मकथा की संस्कृति (2003), निराशा में भी सामर्थ्य (2013)-आलोचना; रघुवीर सहाय (2014)-साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली के लिए विनिबन्ध । इसके अतिरिक्त भर्तृहरि के इक्यावन श्लोकों की हिन्दी अनुरचनाएँ प्रकाशित । रक्तचाप और अन्य कविताएँ तीसरा कविता-संग्रह। 1996 से 2013 तक वी.एस.एस.डी.पी.जी.कॉलेज, कानपुर में अध्यापन। इन दिनों हिन्दी विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) में। पता : सी-95, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.)-470003 मोबाइल : 09425614005

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