Chankya Ki Jaikatha

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-86799-44-9

Author:VISHNU CHANDRA SHARMA

Pages:248


MRP : Rs. 395/-

Stock:In Stock

Rs. 395/-

Details

चाणक्य की जयकथा

Additional Information

ईसा पूर्व तीसरी सदी के नन्दराज्य की व्यवस्था के विरोध में - बुद्धि की तत्परता और शरीर की तत्परता दोनों में बराबर-चाणक्य ने प्रतिपक्ष का सतर्क संघर्ष संगठित किया था। उसने यह बात उस समय देख ली थी-जिसे दो महायुद्धों और तीसरी दुनिया की मुक्ति संघर्ष में बुद्धि और शरीर से तत्पर रहने वाली जनता ने-आज पहचाना है। चाणक्य ऐसे उत्साह वाले वीर रहे हैं, जिसने नन्दराज्य के अधीन तात्कालिक ‘शस्त्र’ को रूढ़ होते हुए और ‘शास्त्र’ की मान्यता को खण्डित होते हुए देख लिया था। कर्म-वीर की भूमिका में उसने उत्साह का एक व्यापक आधार देश में तैयार किया था और बुद्धिवीर की भूमि पर प्रतिपक्ष का संगठन उस समय स्थापित किया था। उसने उस व्यवस्था के विरुद्ध यह संकल्प किया था कि नन्द के सामन्ती प्रभाव को, उसकी व्यवस्था के शास्त्र की रूढ़ि को और सामन्ती दंड विधान के शस्त्र के आधार को वह अपने शरीर और बुद्धि से-अपने संगठित विरोध से-बदल सकता है। चाणक्य सिर्फ सामन्तवाद की स्थिर व्यवस्था को ध्वस्त ही नहीं करना चाहता था बल्कि उसने विरोध की लड़ाई में हिस्सा लेकर अपनी नयी समाज व्यवस्था की परिकल्पना भी उसी दौर में पूरी कर ली थी। अपनी इसी महत् परिकल्पना के केन्द्र में वह स्वयं, राष्ट्रीय उद्योग की तत्परता से, दृढ़तापूर्वक कर्म-वीरों और बुद्धि-वीरों के बीच उपस्थित भी रहा था। चाणक्य और चन्द्रगुप्त के समय का संघर्ष केवल एक वंश, एक नायक, या एक कालखंड का संघर्ष नहीं रहा है। विशाखदत्त के नाटक ‘मुद्राराक्षस’ को पढ़ते समय वह राजनीतिक संघर्ष आज की तरह व्यापक राष्ट्रीय और अप्रत्यक्ष रूप से ही अन्तर्राष्ट्रीय बदलाव का सिलसिला लगता है।

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