Khwabon Ke Hansi (Paper Back)

Format:Paper Back

ISBN:978-93-50728-78-9

Author:Hari Om

Pages:168


MRP : Rs. 195/-

Stock:In Stock

Rs. 195/-

Details

सन 2002 में जब हरिओम की ग़ज़लों की पहली किताब 'धूप का परचम' आयी तो हिंदी-उर्दू ज़बान की सियासी, ग़ैर वाज़िब बहसों के बाहर जाकर ग़ज़ल प्रेमियों ने उसे खूब सराहा-ख़ासकर ग़ज़लों के मज़मून और बात कहने के तेवर को लेकर। तमाम समीक्षकों ने उस किताब पर दुष्यन्त कुमार का असर देखा। स्वयं शायर को भी इस बात से इनकार नहीं है और वह मानता है कि हिंदी ग़ज़लों में दुष्यन्त कुमार एक मेयार हैं। इलाहबाद में रहते हुए वहां की रचनात्मक विरासत का एक हिस्सा जाने-अनजाने उसके भीतर भी उतर आया है और इस विरासत में दुष्यन्त तो हैं ही, इलाहाबाद की संवेदनात्मक और वैचारिक परम्परा भी है। 'धूप का परचम' के तकरीबन पन्द्रह बरस बाद ग़ज़लों की यह दूसरी किताब 'ख़्वाबों की हँसी' पाठकों के सामने है। 'ख़्वाबों की हँसी' में संवेदन और विचार के स्तर पर वैसा उतावलापन और आवेग नहीं है जैसा कि पहले संग्रह में था। यहाँ शायरी में थोड़ा ठहराव, संजीदगी, सब्र और सादगी दिखेगी। हालांकि इस बीच हरिओम ग़ज़लों के अलावा लगातार कहानियां और कविताएँ लिखते रहे लेकिन ग़ज़लें उनके तसव्वुर के दायरे से कभी बाहर नहीं जा सकीं। उसकी एक वजह यह भी थी कि उनके भीतर एक गायक, और वह भी ग़ज़ल गायक, ग़ज़लों-नज़्मों और शेरो-शायरी की हमारी परंपरा से गहरी वाबस्तगी बनाए हुए था। शायरी में चंद लफ़्ज़ों में असरदार बात कहने की ताक़त तो है ही साथ ही मौसीक़ी से उसका रिश्ता उसे और मुफ़ीद बना देता है। 'ख़्वाबों की हँसी' में उनकी कुछ ताजी नज़्में भी शामिल की हैं। उनमें भी आपको एक लयकारी दिखेगी। वे अपनी कविताओं में भी एक लय बरतने की कोशिश करते हैं और मानते हैं कि कविता कितनी भी छंद मुक्त हो जाय यह लयकारी ही उसे गद्य बनने से रोकती है। इस लय को कविता की संरचना से अलगाया नहीं जा सकता।

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About the writer

Hari Om

Hari Om हरिओम जन्म : 15 जुलाई 1971, अमेठी (उत्तर प्रदेश) के कठारी गाँव में। शिक्षा : हिन्दी साहित्य से एम. ए., एम.फिल. और पीएच.डी. (क्रमशः इलाहाबाद, जवाहरलाल नेहरू और गढ़वाल विश्वविद्यालय से)। अन्तरराष्ट्रीय सामाजिक अध्ययन संस्थान (द हेग, नीदरलैंड) से गवर्नेस, पब्लिक पॉलिसी एंड पोलिटिकल इकॉनामी में एम.ए.। कार्यक्षेत्र/पद : भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1997 बैच के अधिकारी (उत्तर प्रदेश कैडर)। प्रदेश के 11 जिलों (इलाहाबाद, कानपुर, गोरखपुर, सहारनपुर, मुरादाबाद, मिर्जापुर आदि) में कलेक्टर जिलाधिकारी रहे। फिलहाल उत्तर प्रदेश सरकार में सचिव स्तर के अधिकारी। प्रकाशन : 'धूप का परचम' (ग़ज़ल), 'अमरीका मेरी जान' (कहानियाँ), 'कपास के अगले मौसम में' (कविताएँ), इसके अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़ल, कविताएँ, कहानियाँ और वैचारिक लेख प्रकाशित। “रीथिंकिंग द रोल ऑफ़ इनफार्मेशन एजुकेशन एंड कम्युनिकेशन इन पार्टिसिपेटरी रूरल सैनिटेशन इन उत्तर प्रदेश : असेसिंग पॉसिबल पॉलिसी लेसंस फ्रॉम बांग्लादेश” विषयक शोध-कार्य यूनीसेफ (उत्तर प्रदेश इकाई) और जर्मन के ग्लोब एडिट प्रकाशन द्वारा प्रकाशित। साहित्य के अलावा संगीत में गहरी दिलचस्पी। एक ग़ज़ल गायक के रूप में फ़ैज़ की ग़ज़लों का एक एलबम 'इन्तिसाब' नाम से गाया है। दूसरा एलबम 'रोशनी के पंख' भी ख़ासा चर्चित रहा। इसके अलावा कई एकल गाने भी गाये। आकाशवाणी और दूरदर्शन से लगातार ग़ज़लें-गीत और साक्षात्कार प्रसारित। सम्मान : अब तक साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान के लिए फ़िराक़ सम्मान, राजभाषा अवार्ड और अवध का प्रतिष्ठित तुलसी श्री सम्मान मिल चुके हैं।

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