Bhatthi Mein Paudha

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-87648-89-0

Author:Kamal Chopra

Pages:160


MRP : Rs. 395/-

Stock:In Stock

Rs. 395/-

Details

भट्ठी में पौधा

Additional Information

कमल चोपड़ा हिन्दी के उन विरल कथाकारों में हैं जो हाशिए पर आँधी पड़ी ज़िन्दगी के आर्तनाद को ही नहीं सुनते, उसकी दम तोड़ती साँसों और सपनों को जिलाने का प्रयास भी करते हैं। विडम्बनाएँ जिन्दगी के साथ अनायास घुन की तरह नहीं लगतीं। सत्ता और वर्चस्व की राजनीति अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु मनुष्य को मोहरा बनाकर जब-जब नचाने लगते हैं, सौहार्द और सामंजस्य के, शान्ति और सहिष्णुता के, प्रेम और विश्वास के, संवाद और संवेदना के कोमल तन्तु टूटने लगते हैं। आश्चर्य कि हाशिए का विस्तार बढ़ते-बढ़ते मुख्यधारा तक चला जाता है और मुख्यधारा सिकुड़ते-सिकुड़ते कुछेक लोगों की बपौती बन जाती है। फिर भी, दोनों के सम्बन्धों और स्थिति में कोई अन्तर नहीं आ पाता। लेखक के कथा-पात्र अपनी हाशियाग्रस्त स्थिति को स्वीकारते हैं, नियति को नहीं। उनके लिए नियति से टकराने का अर्थ किसी अमूर्त ईश्वरीय सत्ता के आगे रोना-गिड़गिड़ाना नहीं, व्यवस्था के दमन-चक्र को खुली चुनौती देना है। ऊर्जा, ओज, पराक्रम, संघर्ष, जिजीविषा और सपने इन कथा-पात्रों की पूँजी है। इसलिए धर्म, जाति, वर्ग, संस्कृति, आर्थिक स्तरीकरण जैसे भेदों-प्रभेदों की श्रृंखला फैलाकर विषमता का ताण्डव करने वाली समाज-व्यवस्था को पलट देना चाहते हैं। आत्मविश्वास और आत्मगौरव के बुनियादी मानवीय गुणों से सिरजे ये कथा-पात्र अपनी ही बेखबरी में खोए उपभोक्तावादी समय के भीतर खलबली मचा देने का दमखम रखते हैं। लेखक का कथा-सरोकारों का वितान खासा बड़ा है। इनका एक छोर 'सर्वभूतेषु' और 'आड़' कहानियों में धर्म के हिन्दू-मुस्लिम खाँचे के पार इंसानी वजूद की समानता को रेखांकित करता है, तो दूसरा छोर ‘गन्दे', 'मुद्दा', 'इज़्ज़त के साथ' कहानियों में 'बलात्कारी समाज' की हैवानियत को सामने लाता है। एक और सिरा भी है जो 'संक्रमण' जैसी कहानी में व्यंग्य की पैनी धार के कारण अनायास रूपक का रूप लेकर सम्भ्रान्त मनुष्य समाज की तथाकथित मनुष्यता को ही कठघरे में ले आता है। आज के दौर में जब जीवन की हर शै बाज़ार में बेच दिये जाने वाला 'सामान' बन गयी हो, तब सहानुभूति को संवेदना में, विचार को ऊर्जा में, आक्रोश को विवेक में ढालकर संघर्ष की प्रतिष्ठा करने वाले कथाकार कमल चोपड़ा न केवल बाज़ार-व्यवस्था के वर्चस्व को तोड़ते हैं, बल्कि अपने 'लघु-मानवों' में 'ईदगाह' के हामिद सरीखी विराटता भरकर समय की नयी इबारत लिखने का हौसला भी करते हैं। 'भट्ठी में पौधा' संग्रह की इन कहानियों में हमारे आज के 'शुद्धतावादी' समय के आतंक की छाप है तो उसे नेस्तनाबूद कर मनुष्य को बचाने की दृढ़ता भी। पठनीय और स्मरणीय कहानियाँ! शिल्प की दृष्टि से भी; भाषा के टटकेपन और देशज महक की वजह से भी। -रोहिणी अग्रवाल

About the writer

Kamal Chopra

Kamal Chopra कमल चोपड़ा जन्मतिथि : सितम्बर, 1955 शिक्षा : चिकित्सा-स्नातक लेखन : कहानी, बाल-कहानी, लघुकथा आदि। लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, लघुकथाएँ व बाल कहानियाँ प्रकाशित। प्रकाशित कृतियाँ : अतिक्रमण (कहानी-संग्रह); अभिप्राय, फंगस, अन्यथा, अनर्थ (लघुकथा-संग्रह); मास्टरजी ने कहा था (बाल उपन्यास)। सम्पादित लघुकथा-संकलन : हालात, प्रतिवाद, अपवाद, आयुध, अपरोक्ष। विशेष : संरचना (वार्षिक) नामक लघुकथा केन्द्रित पत्रिका का सम्पादन। सम्प्रति :स्वतन्त्र लेखन एवं चिकित्सा। सम्पर्क: 1600/114, त्रिनगर, दिल्ली-110035 फोन : 27381899 मोबाइल : 9999945679

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