EK AUR VIBHAJAN

Original Book/Language: बांग्ला भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित. अनुवादक – सुशील गुप्ता

Format:Paper Back

ISBN:9789352291250

Author:MAHASHWETA DEVI

Translation:यहाँ अपनी भी बात कहना जरूरी हो आया है। सन् 1946 के 16 अगस्त का दिन! उन दिनों में, उस ज़माने के धुर दक्षिण कलकत्ते में रहती थी। उन दिनों दक्षिण कलकत्ता, लेक की सीमा तक आकर ख़त्म हो जाता था। हिन्दू महल्ले में रहती थी। वह किसी के विवाह की तारीख़ थी। विवाह के घर में मुस्लिम शहनाई वाले रौशनचौकी बनाकर, शहनाई बजाने आये थे। लेकिन, सब लौट नहीं सके, सब कल भी नहीं हुए। उनमें से। बहुतेरों को शरण भी मिली थी। वे लोग बच गये। हालाँकि उत्तेजना महा भयंकर थी। मैंने दक्षिण कलकत्ता को ख़ून में नहाते देखा है। साथ ही इन्सानों को बचाने के लिए, इन्सानों को प्रबल साहस के साथ सड़क पर उतरते हए भी देखा है। सन् 1964 में, मैं गड़िया में थी। उस वक्त का तजुर्बा भी भयावह था। उन्होंने सपना देखा। उस । सपने को सबमें बिखेर देने का काम, उन्होंने नियमनिष्ठ सिपाही की तरह किया।

Pages:96


MRP : Rs. 125/-

Stock:In Stock

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Details

बांग्ला भाषा से हिन्दी भाषा में अनूदित. अनुवादक – सुशील गुप्ता

Additional Information

यहाँ अपनी भी बात कहना जरूरी हो आया है। सन् 1946 के 16 अगस्त का दिन! उन दिनों में, उस ज़माने के धुर दक्षिण कलकत्ते में रहती थी। उन दिनों दक्षिण कलकत्ता, लेक की सीमा तक आकर ख़त्म हो जाता था। हिन्दू महल्ले में रहती थी। वह किसी के विवाह की तारीख़ थी। विवाह के घर में मुस्लिम शहनाई वाले रौशनचौकी बनाकर, शहनाई बजाने आये थे। लेकिन, सब लौट नहीं सके, सब कल भी नहीं हुए। उनमें से। बहुतेरों को शरण भी मिली थी। वे लोग बच गये। हालाँकि उत्तेजना महा भयंकर थी। मैंने दक्षिण कलकत्ता को ख़ून में नहाते देखा है। साथ ही इन्सानों को बचाने के लिए, इन्सानों को प्रबल साहस के साथ सड़क पर उतरते हए भी देखा है। सन् 1964 में, मैं गड़िया में थी। उस वक्त का तजुर्बा भी भयावह था। उन्होंने सपना देखा। उस । सपने को सबमें बिखेर देने का काम, उन्होंने नियमनिष्ठ सिपाही की तरह किया।

About the writer

MAHASHWETA DEVI

MAHASHWETA DEVI बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी का जन्म 1926 में ढाका में हुआ। वह वर्षों बिहार और बंगाल के घने कबाइली इलाकों में रही हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में इन क्षेत्रों के अनुभव को अत्यन्त प्रामाणिकता के साथ उभारा है। महाश्वेता देवी एक थीम से दूसरी थीम के बीच भटकती नहीं हैं। उनका विशिष्ट क्षेत्र है-दलितों और साधन-हीनों के हृदयहीन शोषण का चित्रण और इसी संदेश को वे बार-बार सही जगह पहुँचाना चाहती हैं ताकि अनन्त काल से ग़रीबी-रेखा से नीचे साँस लेनेवाली विराट मानवता के बारे में लोगों को सचेत कर सकें। गैर-व्यावसायिक पत्रों में छपने के बावजूद उनके पाठकों की संख्या बहुत बड़ी है। उन्हें साहित्य अकादेमी, ज्ञानपीठ पुरस्कार व मैग्सेसे पुरस्कार समेत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

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