DEVDAS

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5000-497-5

Author:SHARATCHANDRA CHATTOPADHYAYA

Pages:128


MRP : Rs. 100/-

Stock:In Stock

Rs. 100/-

Details

देवदास

Additional Information

बांग्ला के शीर्षस्थ लेखक शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय का विश्व-प्रसिद्ध उपन्यास देवदास एक अविस्मरणीय प्रेम कथा है। साथ ही, प्रेम की ट्रेजेडी का इतना सशक्त कोई और उदाहरण साहित्य में उपलब्ध नहीं है। कहते हैं, शरत् बाबू अपनी इस रचना से सन्तुष्ट नहीं थे और इसे प्रकाशित करवाना नहीं चाहते थे। लेकिन 1917 में जब देवदास पहली बार प्रकाशित हुआ, तब इसकी धूम मच गई। बांग्ला के पाठक-पाठिकाओं ने इसे सर-आँखों लिया। तभी से यह उपन्यास लगातार इतना लोकप्रिय बना हुआ है कि बहुत-से लोग शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय को देवदास के लेखक के रूप में ही पहचानते हैं। इस उपन्यास को आधार बना कर बांग्ला, हिन्दी, उर्दू, तेलुगु, तमिल और असमिया में कई फ़िल्में बन चुकी हैं और दर्शकों ने उन्हें बहुत सराहा है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी देवदास को फ़िल्माया जा चुका है। यह देवदास, पार्वती और चन्द्रमुखी, तीनों के असफल प्रेम की करुण कथा है, जिसमें प्रेम की भावना उच्चतम रूप में प्रगट हुई है। देवदास और पार्वती बचपन के मित्र थे, पर उस समय के सामाजिक बन्धनों के कारण उनका परिणय नहीं हो पाता। पार्वती एक अधेड़ जमींदार से ब्याह दी जाती है, पर जीवन भर देवदास को याद करती रहती है। उसके विरह में देवदास शराब और कोठों की जिन्दगी में डूब कर अपने को बरबाद कर लेता है। भटकाव के उन्हीं दिनों में उसकी मुलाकात वार-वधू चन्द्रमुखी से होती है, जो उसके व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर उससे अथाह प्रेम करने लगती है। उसकी पवित्र स्मृति में वह अपना कुत्सित धन्धा छोड़ कर कोलकाता छोड़ देती है और निकट के एक गाँव में सादगी और सेवा का जीवन जीने लगती है। इधर देवदास की हालत निरन्तर बिगड़ती जाती है। पर उसे पार्वती से मिलना जरूर है, क्योंकि वह इसके लिए वचनबद्ध है। लेकिन जब तक वह पार्वती के गाँव तक पहुँचता है, उसकी जीवन यात्रा समाप्त हो चकी होती है। देवदास की ट्रेजेडी इतनी मार्मिक है और चित्रण तथा शैली इतनी शक्तिशाली कि पहले पन्ने से ही पाठक इसकी गिरफ्त में आ जाता है और अन्त तक बँधा रहता है।

About the writer

SHARATCHANDRA CHATTOPADHYAYA

SHARATCHANDRA CHATTOPADHYAYA शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय (15 सितम्बर 1876-16 जनवरी 1938) की गणना बांग्ला साहित्य के मूर्धन्य लेखकों में की जाती है। स्त्री की पीड़ा को व्यक्त करनेवाला ऐसा लेखक कोई दूसरा नहीं हुआ। वे मानव स्वतन्त्रता के उपासक थे। शरत् बाबू का जन्म हुगली जिले के छोटे-से गाँव देवानन्दपुर में हुआ था। इनकी पढ़ाई-लिखाई में रुचि नहीं थी। इसलिए अकसर घर से भाग निकलते। कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर बर्मा पहुँच गये। कलकत्ता लौटने के बाद उनकी लेखन प्रतिभा का विस्फोट हुआ। शरत्चन्द्र की प्रमुख रचनाएँ हैं – चरित्रहीन, श्रीकान्त, गृहदाह, पथेर दावी, देना-पावना और शेष प्रश्न। भारत तथा विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में शरत् बाबू के उपन्यासों का अनुवाद हो चुका है। शरत्चन्द्र की लोकप्रियता का मुख्य आधार है उनके कथा चरित्रों का विद्रोही व्यक्तित्व। उनके उपन्यासों में बहुत ही मार्मिकता के साथ यह चित्रित किया गया है कि नारी किस प्रकार परम्परागत बन्धनों से छटपटा रही है और स्त्री-पुरुष सम्बन्ध की नयी नैतिकता का आधार क्या हो सकता है।

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