BHOOMIPUTRA

Format:Paper Back

ISBN:978-93-8715-598-5

Author:NAZRUL ISLAM

Pages:488


MRP : Rs. 175/-

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भूमिपुत्र

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प्राईमरी स्कूल तथा हाईस्कूल के नीचे की कक्षाओं में पढ़ते समय कमाल शरीयत के अनुसार चलता था। रोज़े के दिनों रोज़ा रखता था। दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ता था। कक्षा नौ में पहुंचकर वह कुछ बदल गया। कक्षा सात से वह बांग्ला तथा अंग्रेज़ी के साथ तीसरी भाषा के रूप में अरबी पढ़ता था। प्राईमरी स्कूल में रहते ही स्वर चिह्नों की सहायता से अरबी भाषा में कुरान पढ़ना सीख गया था। इसीलिए उसने संस्कृत के बजाय अरबी ली थी। दो साल की पढ़ाई के बाद कई शब्दों के अर्थ वह समझ लेता था। उम्मीद थी कि कुछ साल और पढ़ने के बाद वह कुरान भी समझने लायक हो जाएगा। लेकिन कक्षा नौ में पहुँचकर विज्ञान लेने के कारण अरबी की पढ़ाई रोक देनी पड़ी। आखिरकार उसे काफ़ी ढूँढ़ने के बाद कुरान का बांग्ला अनुवाद मिल गया। जितने दिनों तक वह बिना अर्थ समझे कुरान पढ़ता था, कुरान का सूरा पढ़कर नमाज़ पढ़ता था, उतने दिनों तक लगता कि वह कोई ज़बर्दस्त चीज़ पढ़ रहा है। लेकिन अर्थ समझने के बाद ये सब उसे बहुत साधारण लगने लगीं। जैसे कि कुरान का प्रथम सूरा फ़ातिहा जिसे हर रकात नमाज़ के साथ पढ़ना पड़ता है अर्थात् भोर में सूरज उगने के पहले। फ़ज्र की नमाज़ के समय चार बार, दोपहर में ज़ोहर। की नमाज़ के समय बार-बार (शुक्रवार को पुरुषों के जुमे की नमाज़ के समय बीस बार), शाम को आसर की नमाज़ के समय आठ बार, साँझ को सूरज के। डूबने के बाद मगरिब की नमाज़ के समय सात बार, रात के प्रथम प्रहर में ईशा की नमाज़ के समय तेरह बार अर्थात् दिन में चौवालीस या बावन बार अनिवार्यतः पढ़ना पड़ता है, उसका अर्थ इस प्रकार “सारी प्रशंसाएँ विश्व-जगत के प्रतिपालक अल्लाह के लिए ही हैं। वे असीम दयालु, परम दयामय हैं। वे फ़ैसला करनेवाले दिन के मालिक हैं। हम सिर्फ आप ही की उपासना करते हैं और आपकी ही सहायता चाहते हैं। हम लोगों को सरल मार्ग पर चलाइए। उनके मार्ग पर-जिनके प्रति आपने कृपा की है, जो आपके क्रोध के शिकार नहीं हुए और पथभ्रष्ट नहीं हुए।" कमाल को लगता था कि अगर इस पर कोई यक़ीन भी करता हो तो भी अपना काम-धाम छोड़कर इतनी बार कहने की क्या ज़रूरत है? ऐसा न करने पर पाप लगेगा। क्यों? इनको बार-बार नहीं पढ़ने से किसी का कोई नुकसान तो नहीं हो रहा है। अगर अल्लाह नाम के कोई हों भी तो यह सब करने या न करने से उनका तो कोई नुकसान नहीं होता। तो फिर पाप क्यों लगेगा? किसी का खून करने, उसका नुकसान करने से पाप की बात समझ में आती है। किसी की सहायता करने पर पुण्य होने की बात भी सच लगती है। लेकिन किसी की प्रशंसा करने पर ही पुण्य होता है, यह कैसी बात हुई। यह तो बड़े आदमियों की मुसाहबी जैसी बात हुई। अल्लाह की प्रशंसा करो। स्वर्ग में जाओगे। अगर ऐसा न करो तो भले ही जितना अच्छा काम करो, स्वर्ग का दरवाज़ा तुम्हारे लिए नहीं खुलेगा। इसे किसी भी तरह स्वीकारा नहीं जा सकता। (इसी उपन्यास से...)

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