BahadurShah Ka Mukadama

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5000-330-5

Author:KHWAZA HASAN NIZAMI

Pages:168


MRP : Rs. 95/-

Stock:In Stock

Rs. 95/-

Details

बहादुरशाह का मुक़दमा

Additional Information

सत्तावनी संग्राम की असफलता के बाद दिल्ली के उसी लाल किले में, जिसके सामने से होकर हम आप अक्सर गुज़रते हैं, ब्रिटिश हुकमत ने अदालत का एक ढोंग रचा था और बहादुर शाह जफ़र को उस अदालत के सामने एक मजरिम के बतौर पेश होना पड़ा था। इक्कीस दिनों तक चली उस अदालती कार्रवाई के अंत में, बहादुरशाह के बार-बार यह कहने के बावजूद कि मैं तो बस नाम-भर का बादशाह था, "जिसके पास न खज़ाना, न फौज़, न तोपखाना। मैंने अपनी इच्छा से कोई हुक्म नहीं दिया," जाँच कमीशन के अध्यक्ष लेफ्टिनेंट कर्नल एम. डॉस और डिप्टी जज एण्डवोकेट जनरल मेजर एफ. जे. हेरियट ने इस मसौदे पर दस्तख़त किए कि "अदालत उन गवाहियों पर एक मत है कि बादशाह उन अभियोगों के अपराधी हैं, जो कि कहे गए हैं।" भारत के ब्रिटिशकालीन दौर और 1857 के प्रथम स्वातंत्र्य समर का विधिवत् अध्ययन करने के लिए बहादुरशाह का मुक़दमा एक अमूल्य ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। उसे अरसा पहले, 1857 की दिल्ली के वाहिद इतिहासकार मरहम ख्वाज़ा हसन निज़ामी ने संपादित करके उर्दू में प्रकाशित कराया था, जिसका यह हिंदी अनुवाद अब आपके हाथों में है।।

About the writer

KHWAZA HASAN NIZAMI

KHWAZA HASAN NIZAMI ख्वाज़ा हसन निज़ामी मरहूम ख्वाज़ा हसन निज़ामी का जन्म इस्लामी पंचांग के अनुसार 2 मुहर्रब 1296 हिजरी (तद्नुसार 1876 ई. के आसपास) को हुआ था। उनके नाना हजरत ख्वाज़ा गुलाम हसन, न सिर्फ़ 1857 के गदर के दौरान जीवित थे। बल्कि जब हमायूँ के मकबरे से बहादुरशाह ज़फर को अंग्रेज़ी फ़ौज ने गिरफ्तार किया, तब वे वहाँ मौजद भी थे। निज़ामी साहब ने लगभग 80 वर्ष की उम्र पाई और इस लम्बी उम्र में उन्होंने अध्यात्म और इतिहास की बहुत-सी किताबें लिखीं, जिनकी संख्या सैकड़ों में है। कुरान का पहला हिंदी तर्जुमा उन्होंने ही किया था और खट ही प्रकाशित किया था। कृष्ण और नानक की जीवनियाँ भी उन्होंने उर्दू में लिखी थीं, जो अपने समय में काफ़ी लोकप्रिय हई थीं। निज़ामी साहब पर वेदांत दर्शन का गहरा असर था और उससे प्रेरित होकर पैगम्बरुल इस्लाम के बारे में उन्होंने एक रचना 'मन के इक धोबी' शीर्षक से रची थी, जिसमें हजरत मोहम्मद को धोबियों का चौधरी कहा गया है। इस धोबी से आशय उस दिव्यत्व से है, जो आदमी के बाहर-भीतर का सारा मैल धो दे। दिलचस्प बात यह है कि अभी हाल में पाकिस्तान सरकार ने निज़ामी साहब की उक्त रचना पर पाबंदी लगा दी है। लेकिन भारत के राष्ट्रीय आंदोलन और इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से, निज़ामी साहब का महत्व उनकी 1857 की दिल्ली से संबंधित किताबों के लिए है। यद्यपि 1857 की ऐतिहासिक घटनाओं पर रोशनी डालनेवाली बहत-सी उल्लेखनीय सामग्री अब तक आ चुकी है, तब भी, ख्वाज़ा हसन निज़ामी की कृतियों का अपना अलग महल है, क्योंकि वे गहरी मानवीय दृष्टि और राष्ट्रीय भावना से उस ऐतिहासिक सामग्री के आधार पर लिखी गई हैं। जहाँ इतिहासकार और शोधार्थी प्रायः नहीं पहुँच पाते। 1857 से संबंधित निज़ामी साहब की उन महत्त्वपूर्ण कृतियों में से कुछेक के नाम इस प्रकार हैं : 1. गदर की सुबहशाम, 2. बेगमात के आँस. 3. अंग्रेजों की विपदा, 4. गिरफ्तारशुदा खुतूत, 5. बहादुरशाह ज़फ़र व मटकाफ के रोज़नामचे, 6. ग़ालिब का रोजनामचा, और। 7. बहादरशाह पर मुकदमा। उन्होंने कई अखबार और रिसाले भी समय-समय पर निकाले, जिनमें से 'मनादी' (1926 में शुरुआत) का प्रकाशन मरहूम निज़ामी साहब के सुपुत्र ख्वाजा हसन सामी निजामी अब तक जारी रखे। हुए हैं। ख्वाज़ा हसन निज़ामी का निधन 31 जुलाई 1955 को हुआ।।

Customer Reviews

No review available. Add your review. You can be the first.

Write Your Own Review

How do you rate this product? *

           
Price
Value
Quality