Hindi - Sahitya Ka Ateet -1

Format:Paper Back

ISBN:978-93-5072-689-1

Author:ACHARYA VISHWANATH PRASAD MISHRA

Pages:344


MRP : Rs. 225/-

Stock:In Stock

Rs. 225/-

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हिन्दी साहित्य का अतीत - 1

Additional Information

भारत में जितने प्रकार की भारती (भाषाएँ) पाई जाती हैं किसी दूसरे देश में उतने प्रकार की नहीं। भाषाविज्ञानियों ने भाषा समाजप्रधान, प्रत्ययप्रधान और विभक्ति प्रधान तीन प्रकार की मानी हैं। तीनों प्रकार किसी-न-किसी रूप में भारत में चलते हैं; इन प्रकारों के जो उपभेद किए गए हैं वे भी। भारत की भारती की यह बहुत बड़ी विलक्षणता है। ऐतिहासिक दृष्टि से इसका कारण यह कहा जाता है कि इस देश में समय-समय पर बाहर से अनेक जातियाँ आती रही हैं और उनकी भाषाएँ भी उनके साथ किसी-न-किसी रूप में लगी आई हैं। वे इस देश की भाषाओं को प्रभावित भी करती रही हैं और उनमें से बहुत-सी अपने मूल और परिवर्तित रूप में बनी भी रह गई हैं। भाषाओं के इतिहास का जो विचार आधनिक युग में हआ है उसमें कार्य करने वाले पश्चिमी भाषा शास्त्र के विद्वान रहे हैं और वे जो कुछ सोचते विचारते रहे हैं, अपने ढंग से सोचते-विचारते और समझते-समझाते रहे हैं। भारत की आर्य भाषाओं के सम्बन्ध में उन्होंने जो सिद्धांत निश्चित किए हैं वे आर्यों के आदि देश के सिद्धांत से सम्बद्ध हैं। राजनीतिक दृष्टि से आर्यों का आदिनिवास भारत से बाहर स्वीकार करना उन्हें अभीष्ट था। अतः भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में जो निश्चय किए गए उन पर इस पूर्वस्वीकृत मान्यता का भी प्रभाव पड़ा है। सभी आर्य भाषाओं का मूल स्रोत किसी कल्पित जननी भाषा में मानना और उसकी विभिन्न शाखाओं के रूप में भारतीय तथा पश्चिमी आर्य-भाषाओं को पृथक् विकास का परिणाम कहना इस धारणा के कारण भी बहुत कुछ रहा है। इसके लिए एक उदाहरण लीजिए। कहा जाता है कि भारतीय आर्य लोग समुद्र से परिचित नहीं थे, इसलिए भाषा में उन आर्यों की भाषा का एक शब्द, जो समुद्र से परिचित थे, नहीं मिलता। यह शब्द लातीनी का मेरिनस या मेयर है जो यूरोप की सभी आर्य भाषाओं में किसी-न-किसी रूप में मिलता हैं अंगरेजी में इसे 'मेरीन' कहते हैं। पर क्या यह कल्पना ठीक है। ऋग्वेद में भारतीय आर्यों के समुद्रज्ञान का उल्लेख है-'वेद नाव समुद्रियः'। वरुण समुद्र के देवता हैं। आज भी वरुण की पूजा जल देवता के रूप में भारतीय आर्यों में मिलती है। अँगरेजी के मेरीन और लातीनी के मेयर से ध्वनि साम्य रखने वाला 'मीर' शब्द समुद्र के अर्थ में संस्कृत में मिलता है और लक्ष्मी का नाम 'मीरजा' भी। हिन्दी के सुप्रसिद्ध विद्वान् परम आनंद जीव श्री बदरीनारायण चौधुरी 'प्रेमघन' मिर्जापुर को मीरजापुर अर्थात् लक्ष्मीपुर कहा करते थे, यह कल की बात है आज वहाँ वाले यही आंदोलन कर रहे हैं कि इसका नाम 'मीरजापुर' माना और लिखा-पढ़ा जाय। अतः किसी पूर्वनिश्चित मान्यता के अनुसार भाषा विज्ञान के क्षेत्र में कोई मत स्थिर करना खटके से खाली नहीं।

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ACHARYA VISHWANATH PRASAD MISHRA

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