Siddharth Kee Pravrajya

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-89563-14-6

Author:DR. VIKRAM SINGH

Pages:120


MRP : Rs. 299/-

Stock:In Stock

Rs. 299/-

Details

सिद्धार्थ की प्रवृज्या

Additional Information

निजी जीवन में वैभव और विलासिता युक्त जीवन के लिए हो रही अन्धी दौड़ और समाज में दबदबा कायम करने हेतु शक्ति प्रदर्शन के लिए शस्त्रों की होड़ से सम्भावित हिंसा और अनिश्चय के वातावरण में विक्रम सिंह जैसे संवेदनशील रचनाकार को बुद्ध के त्याग, सदाचार युक्त जीवन तथा लोक कल्याण के लिए उनके द्वारा प्रतिपादित ‘मध्यम मार्ग' का स्मरण होना स्वाभाविक ही है। अपने लेखकीय दायित्व की पूर्ति के लिए उनके द्वारा अभिव्यक्ति की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा नाटक की कथावस्तु के माध्यम से बुद्ध की देशना को जन सामान्य तक पहुँचाने का प्रयास निश्चित रूप से श्लाघ्य है। भौतिकता की भागमभाग और हिंसा (युद्ध) की आशंका से उत्पन्न अनिश्चितता के वातावरण से ऊब चुके वक़्त ने सुनिश्चित भविष्य के लिए धूल खाती ‘पालि' पाण्डुलिपियों की जब धूल झाड़ी तो नैतिक रूप से अस्वस्थ हो चले समाज को स्वस्थ और दीर्घायु बनाने वाले बुद्ध के तमाम नुस्खे बिखर गये। बिखरे हुए बुद्ध के इन अनमोल नुस्खों को साहित्य, कला और दर्शन के माध्यम से लोक जीवन की आवोहवा में फिर से बिखेरने की आवश्यकता के दृष्टिगत त्रिपिटकों, जातक कथाओं और अवहट्ठकथाओं का विभिन्न भाषाओं में न सिर्फ अनुवाद हुआ बल्कि कविता, कहानी, नाटक आदि साहित्य की विभिन्न विधाओं की कथावस्तु के रूप में भी प्रस्तुत हुआ। बुद्ध के विचारों का इस रूप में प्रस्फुटन समय की आवश्यकता है। वक़्त की इसी नब्ज़ को पकड़ा है डॉ. विक्रम सिंह ने; इसी का परिणाम है उनका नाटक ‘सिद्धार्थ की प्रवृज्या' । इसमें प्रयुक्त संवाद की लोकशैली और संवादों के बीच में उदात्त दार्शनिक विचारों का प्रस्तुतीकरण नाटक की उपादेयता को प्रमाणित करता है।

About the writer

DR. VIKRAM SINGH

DR. VIKRAM SINGH जन्म : 01 जुलाई, 1960, गाँव बन्सरमऊ, जनपद मैनपुरी (उ.प्र.)। शिक्षा : एम.ए., पीएच.डी.। पुरस्कार : 'विजयदेव नारायण साही पुरस्कार' 1996-97, 'सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय पुरस्कार' 2003-04, 'यशपाल पुरस्कार' 2005-06, ‘कौटिल्य पुरस्कार' 2008-09, ‘महापण्डित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार 2009-10, ‘पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार' 2010-11। प्रकाशन : प्रिंटिंग-मिस्टेक, लकड़बग्घे : शहर में (काव्य संकलन), तदर्थ (रेडियो - नाटक), मम्मी : फादर मायने क्या?, सरहद (पटकथा), ताजमहल से टॉवर ब्रिज, सूरज : चाँदनी रात में, नार्वे : दि चैम्पियन ऑफ़ वर्ल्ड पीस (यात्रा-वृत्तान्त), पानी के निशान (कहानी संग्रह), यथार्थ के समानान्तर (निबन्ध संग्रह), भारत में राजनीतिक चिन्तन की परम्परा (भारत-शास्त्र), हायनाज इन टाउन तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर कविता, कहानी, लेख, यात्रा वृत्तान्त आदि। शीघ्र प्रकाश्य : काले शीसे (कविता संग्रह), समकालीन हिन्दी कविता (आलोचना), गैलीलियो का माफ़ीनामा (नाटक), कहानी संग्रह ‘पानी के निशान' का अंग्रेज़ी, उर्दू एवं बंगला अनुवाद। सदस्य : हिन्दी सलाहकार समिति विदेश विभाग- 2000-03 । प्रसारण : टी.वी. रेडियो (बीबीसी लन्दन एवं भारत के विभिन्न केन्द्रों से) तथा भारतीय एवं अन्तरराष्ट्रीय साहित्यिक मंचों से। रंगमंच : निर्माता 'कोर्टमार्शल' एवं 'अँधेरे में' नाटक। सान्निध्य : संस्थापक अध्यक्ष – ‘ग्लोब', 'नवयुग' साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं व 'अभिनय' नाट्य समिति, आगरा।

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