Chitti Zananiyan

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-8956-367-2

Author:Rakesh Tiwari

Pages:176

MRP:Rs.450/-

Stock:In Stock

Rs.450/-

Details

चिट्टी ज़नानियाँ

Additional Information

राकेश तिवारी की कहानियों में क़िस्सागोई बहुत रोचक है। उस क़िस्सागोई के साथ उनकी भाषा में खिलंदड़ापन भी है। उनकी कहानियों में स्त्रियों का जो चरित्र आया है उसमें स्त्रियों का आक्रोश सामने आया है। स्त्रियों का कड़ा संघर्ष है। उनकी तेजस्विता दिखाई देती है। इसके साथ हास्यास्पद स्थितियाँ काफ़ी हैं। सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत है। गम्भीरता के बीच में वह ह्यूमर गम्भीरता को और भी तीव्र करता है। भाषा पर लेखक का अधिकार है। इतना गठा हुआ गद्य कम पढ़ने को मिलता है। -प्रो. नामवर सिंह (सबद निरन्तर, दूरदर्शन)/ राकेश तिवारी समसामयिक दौर की सामाजिक-ऐतिहासिक उच्छृखलता के साक्षी रचनाकार हैं। नव उदारवादी आर्थिक दौर में सामन्तवादी क्रूरता की यातना उनकी कहानी में चित्रित की गयी है। इस दौर का मनमानापन ऊपर से देखने में ऊटपटाँग और हास्यास्पद लगता है। दारुणता यह है कि यह हास्यास्पदता तो सिर्फ़ रूप है, इसकी अन्तर्वस्तु अभूतपूर्व अमानवीयता है। पूँजीवाद की हास्यास्पदता 'चटक-मटक' प्रकाश-कोलाहल से भरा उसका मनोरंजक रूप कितना हिंसक और अपराधी है, इसे राकेश तिवारी की कहानियाँ प्रकट करती हैं। -डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी (कथादेश) / समकालीन हिन्दी कहानी के परिदृश्य में राकेश तिवारी की उपस्थिति एक ऐसे कहानीकार के रूप में है जिनकी कहानियाँ रूपकों और प्रतीकों के साथ फ़न्तासी के समन्वित प्रयोग से समकालीन जीवन की विडम्बनाओं को बेपर्दा करती हैं। यह कथा-संसार विरूपित समय की विभीषिकाओं और सम्बन्धों में आयी अर्थहीनता के साथ-साथ उपभोक्तावादी आपदाओं को भी दिखाता है। ...उनकी कहानियों का सधा हुआ शिल्प और भाषा के लाघव में प्रतीकात्मक विन्यास का स्तर इतना अर्थगर्भित है कि सहसा विश्वास नहीं होता कि हम कहानी पढ़ रहे हैं या किसी भयानक स्वप्न से गुज़र रहे हैं। -ज्योतिष जोशी (नया ज्ञानोदय) /राकेश तिवारी कहानी विधा को समय के दस्तावेज़ीकरण का माध्यम भी मानते हैं और माध्यम की विशिष्टता/अनोखेपन के प्रति पूरी तरह सजग भी हैं। ...उनकी कहानियाँ अपने कहानी होने की अनिवार्यता का बोध कराती हैं और पढ़ते हुए लगता है कि उनके कथ्य को उनके पूरे रचाव से छुड़ाकर कहना कितना मुश्किल होगा। विधा/माध्यम के अनोखेपन को इस तरह सुरक्षित रखते हुए ही ये कहानियाँ अपने समय के संकटों, रुझानों, अन्तर्विरोधों को पकड़ने का जतन करती हैं और इस मामले में भी कहानीकार की अचूक क्षमता का परिचय देती हैं। -संजीव कुमार (हंस) *यहाँ दी गयी आलोचकों की राय इस संग्रह के बारे में नहीं है।

About the writer

Rakesh Tiwari

Rakesh Tiwari उत्तराखंड के गरमपानी (नैनीताल) में जन्म। एक समय सारिका, धर्मयुग, रविवार, साप्ताहिक हिन्दुस्तान से लेकर तमाम पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों के प्रकाशन के साथ चर्चित। लम्बी खामोशी के बाद फिर से कथा-लेखन में सक्रिय और इधर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों से फिर चर्चा में। कुछेक कहानियों का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद। एक कहानी पर फिल्म बनी है और एक कहानी के नाट्य-रूपान्तरण के बाद कई शहरों में नाट्य प्रस्तुतियाँ। कुछ कहानियाँ अन्य लेखकों द्वारा सम्पादित संग्रहों में शामिल। व्यंग्य सहित साहित्य की दूसरी विधाओं के अलावा बाल साहित्य लेखन भी। शुरुआती दौर में रंगकर्म और पटकथा लेखन से भी नाता। छिटपुट तौर पर पत्राकारिता का अध्यापन और अनुवाद कार्य भी। पहला कहानी संग्रह ‘उसने भी देखा’ (1993) और एक बाल उपन्यास ‘तोता उड़’ प्रकाशित। एक उपन्यास और पत्राकारिता पर एक पुस्तक का प्रकाशन शीघ्र ही। लम्बे समय से पत्राकारिता में रहते हुए राजनीति, खेल, कला, फिल्म, पर्यावरण, जनान्दोलन और अन्य समसामयिक मुद्दों पर लेखन और रिपोर्टिंग। साहित्यिक-सांस्कृतिक रिपोर्टिंग को नया आयाम और नये तेवर देने वाले पत्राकार के रूप में विशिष्ट पहचान। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में घुसपैठ और ताकझाँक के विविध अनुभव। वर्तमान में इंडियन एक्सप्रेस समूह के दैनिक जनसत्ता में विशेष संवाददाता।

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