Ishq Lamhe

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-8901-235-4

Author:Ameeta Parsuram 'Meeta'

Pages:124

MRP:Rs.349/-

Stock:In Stock

Rs.349/-

Details

'मेरा होना भी बस हुआ यूँ ही' शाइरी में मौजूद होने की एक सूरत, जिये होने को दोबारा जीने और हो चुके को अज़-सर-ए-नौ होने से गुज़ारने से बरू-ए-कार आती है। ज़िन्दगी करने या जीने के अमल को हू-ब-हू शाइरी में लाना मुहाल है, क्योंकि इसमें ऐसा बहुत कुछ होता है, जो शाइरी का ख़ाम माल तो बन सकता है, शाइरी नहीं बन सकता। दूसरी बात ये कि ज़िन्दगी करने के अमल पर हमारा कोई इख़्तियार नहीं होता। जबकि शाइरी में दोबारा की और जी जाने वाली ज़िन्दगी पूरी तरह हमारे इख़्तियार में होती है, क्योंकि ये ज़िन्दगी नहीं उसका अक्स होती है, और हम उसे बाहर से मारूज़ी तौर पर देख सकते हैं। अमीता परशुराम ने अपनी शाइरी में इसी इख़्तियार का बख़ूबी इस्तेमाल किया है। उनके यहाँ होने न होने, पाने-खो, मिलने-बिछड़ने के तजुर्बात जिस शिद्दत के साथ बयान में आते हैं, उसका सबब भी यही मालूम होता है कि उन्होंने अपने आप और ज़िन्दगी को बाहर से देखने वाली आँख हासिल कर ली है, एक और बात जो तवज्जो खींचती है कि उनके बेशतर शेर ग़ज़ल के माहौल में बसे मालूम होते हैं, यानी ग़ज़ल-ख़ानदान के फ़र्द नज़र आते हैं। और ये इसलिए मुमकिन हुआ है कि उर्दू की लफ़्ज़ियात और मुहावरे पर उनकी गिरफ़्त ख़ासी मालूम होती है। बेशतर शेरों को दो खानों में रखा जा सकता है, बाज़ शेर सिर्फ़ जज़्बात का इज़हार होते हैं और कुछ सिर्फ़ सोचे हुए, दोनों ही शाइरी की बे-आबरूई का बायस बनते हैं। अमीता परशुराम ने दूसरा और मुश्किल रास्ता इख़्तियार किया है। उनके शेर जज़्बों और महसूसात को समझने की कोशिश का हासिल होते हैं । इसलिए उनमें फ़िक्र की संजीदगी भी होती है और जज़्बों की आँच भी। हाँ निभाये हैं मोहब्बत के फ़राइज़ मैंने मुस्तहिक़ भी हूँ मगर कोई भी इनआम न दे उसने मेरी ही रफ़ाक़त को बनाया मुल्ज़िम मैं अगर भीड़ में थी वो भी अकेला कब था बज़्म-ए-शेर में ऐसे शेरों की शाइरा का ख़ैर-मक़दम है। -फ़रहत अहसास

Additional Information

“अमीता परशुराम ब-हैसियत शाइरा और ब-हैसियत इन्सान दोनों तरह से मुतवज्जह करती हैं। वह शेर कहें या गुफ्तगू करें, उनके लहजे की नर्मी मुतास्सिर किये बिना नहीं रहती। उन्होंने गज़लें, नज़्में और क़तआत भी कहे हैं लेकिन वह अस्ल में ग़ज़ल की शाइरा हैं। इश्क़ लम्हे उनके ख़ूबसूरत तख़लीक़ी तजुर्बातों-महसूसात का आईना है और उनका पहला शेरी कलेक्शन होने के बावजूद गहरा नक़्श छोड़ता है। अमीता जी की शाइरी में इश्क मर्कज़ी हैसियत रखता है। जिसको सरसरी तौर पर नहीं देखा जा सकता। इश्क़ को उन्होंने कई जहतों और सतहों पर शाइरी बनाया है। वह ज़िन्दगी और इन्सान को अपनाइयत से देखती हैं और अपने तजुर्बो को सच्चाई के साथ बयान करती हैं। मैं उनको इश्क़ लम्हे के लिए मुबारकबाद पेश करता हूँ।” - प्रो. शहपर रसूल/ “अमीता परशुराम की ग़ज़लें उर्दू ग़ज़ल की रिवायत की पासदारी तो करती ही हैं साथ में हमें ग़ज़ल के उस जदीद लबो-लहजे से भी मुतारुफ़ कराती हैं जो हर उस सच्ची और अच्छी शाइरी की ख़ूबी है जो अपने ज़माने और अपने अहद से आँखें मिलाने के हौसले से जन्म लेती है। ये बहुत बड़ी बात है कि अपने शेरों की सादगी और भरपूर कैफ़ियत की वजह से अमीता परशुराम ग़ज़ल-गो शाइरों की भीड़ में अपनी पहचान और मुक़ाम बनाने में पूरी तरह कामयाब नज़र आती हैं। उनके हर शेर में ज़बरदस्त कैफ़ियत और शदीद अहसास की दौलत छुपी हुई है। उनकी शाइरी उनको अपने ज़माने के दूसरे लिखने वालों से बिल्कुल अलग और मुम्ताज़ करती है। मैं उन्हें इस मजमुए के शाया होने पर मुबारकबाद पेश करता हूँ - शारिक़ कैफ़ी

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