Swadeshi Ki Sanskriti

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-5000-499-9

Author:MANOHAR SHYAM JOSHI

Pages:190


MRP : Rs. 375/-

Stock:In Stock

Rs. 375/-

Details

स्वदेशी की संस्कृति

Additional Information

जहाँ तक हिन्दी पत्रकारिता की बात ठहरी तो लखनऊ विश्वविद्यालय से बी.एससी. तक की पढ़ाई पूरी कर ज़माने के ख़्याल से दिल्ली पहुँचे जोशी जी नाटककार चिरंजीव की मेहरबानी से दैनिक 'जनसत्ता' के समाचार एवं सम्पादकीय पृष्ठों के लिए पाँच से सात रुपये कालम की दर से अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद के काम से लगे। रविवारीय परिशिष्टों के लिए तो लखनऊ वाले दिनों से ही लिख रहे थे। अज्ञेय जी तब आकाशवाणी समाचार विभाग के हिन्दी सलाहकार थे और आकाशवाणी भवन में ही उनका कार्यालय था, जहाँ बैठते थे। लखनवी कविमित्र रघुवीर सहाय ने, जो आकाशवाणी समाचार विभाग में कार्यरत थे, किसी दिन जोशी जी को अज्ञेय जी से मिलवाया। जोशी जी की प्रतिभा-क्षमता के मुताबिक रघुवीर सहाय ने शायद पहले से ही अज्ञेय जी को अवगत करा छोड़ा था। आमने-सामने की उस पहली मुलाकात तथा दो-चार वाक्योंवाली बातचीत में ही अज्ञेय जी ने जोशी जी की हिन्दी-अंग्रेज़ी प्रतिभा का मोटा-मोटी आकलन कर लिया होगा और बस...! जोशी जी आकाशवाणी से कैजुअल आर्टिस्ट की हैसियत से जुड़े, बाद को स्टाफ आर्टिस्ट के रूप में तरक्की हासिल की, फ़िल्म्स डिवीजन की नौकरी से जुड़कर 1959 में मुम्बई पहुँचे, साप्ताहिक 'धर्मयुग' के लिए सम्पादक डॉ. धर्मवीर भारती की इच्छानुसार विविध विषयक लेखन कार्य किये और यह सब करते हुए एक दिन भारतीय सूचना सेवा के क्लास वन पदाधिकारी की कुर्सी तक पहुँचे। फिर वह दिन आया सन् 1964 में जब दिल्ली से हिन्दी समाचार साप्ताहिक 'दिनमान' के प्रकाशन की योजना अपने अन्तिम रूप में पहुँची, पत्रिका के प्रस्तावित सम्पादक अज्ञेय सरकारी सेवा से त्यागपत्र दिलवाकर जोशी जी को मुम्बई से दिल्ली ‘उड़ा' लाये और 'दिनमान' वाला ही दौर रहा। अज्ञेय के शिष्यत्व में। जहाँ पूरा-का-पूरा लगभग तीन वर्ष गुजारकर पूरी तरह। सिद्ध एवं पारंगत पत्रकार वाली छवि के साथ जोशी जी। 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' की कुर्सी तक पहुँचे।। (भूमिका से)

About the writer

MANOHAR SHYAM JOSHI

MANOHAR SHYAM JOSHI मनोहर श्याम जोशी 9 अगस्त, 1933 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी ‘कल के वैज्ञानिक’ की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्रा जीवन से ही लेखक और पत्राकार बन गये। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आषीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21वें वर्श से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गये। प्रेस, रेडियो, टी.वी., वष्त्तचित्रा, फिल्म, विज्ञापन-सम्प्रेशण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो। खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विशय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता चला आया है। पहली कहानी तब छपी थी जब वह अठारह वर्श के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्श के होने आये। केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए सन् 1967 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी सम्पादन किया। टेलीविजन धारावाहिक ‘हम लोग’ लिखने के लिए सन् 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से स्वतन्त्रा लेखन करते रहे । निधन: 30 मार्च 2006।

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