Raagbodh Aur Ras

Format:Hard Bound

ISBN:978-81-8143-015-1

Author:KANAK TIWARI

Pages:116


MRP : Rs. 100/-

Stock:In Stock

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रागबोध और रस

Additional Information

एक उदाहरण स्वप्नवासवदत्त के पंचम अंक से राजा ने सुना था कि पद्मावती कुछ अस्वस्थ है और इसी जगह होगी। आते हैं तो देखते हैं शय्या सूनी पड़ी है। पर उन्हें शय्या को देखने पर लगता है कि कोई यहाँ सोया नहीं था क्योंकि शय्या बिलकुल समतल पड़ी है। कहीं चादर में सिलवट नहीं पड़ी है। कहीं सिर दर्द दूर करने के लिए लगाए गए लेप का निशान तकिया पर नहीं पड़ा हुआ है। इसी प्रसंग में विदूषक कहता है कि आप यहीं प्रतीक्षा करें। पद्मावती आती ही होगी। विदूषक से राजा कहते हैं, कहानी सुनाओ, ताकि नींद आ जाए। विदूषक कहानी शुरू करता है। उज्जयिनी से शुरू करता है। उज्जयिनी का नाम सुनते ही राजा को वासवदत्ता याद आती है। विदूषक कहता है, अच्छा दूसरी कहानी शुरू करता हूँ, ब्रह्मदत्त नाम का राजा है। काम्पिल्य नाम की नगरी है। राजा सुधारता है-मूर्ख, राजा काम्पिल्य, नगर ब्रह्मदत्त। विदूषक ने इसी को कई बार रटना चाहा। इतने में राजा को नींद आ जाती है। विदूषक अपनी उत्तरीय कन्धे पर ओढ़कर हट जाता है। इतने में वासवदत्ता पद्मावती की अस्वस्थावस्था सुनकर समुद्रगृह आती है। वासवदत्ता उस शय्या पर लेट जाती है और उसे लगता है कि शय्या पर लेटते ही उच्छ्वास होता है। इतने में स्वप्न में राजा वासवदत्ता को पुकारते हैं। पहले वासवदत्ता घबड़ाती है कि कहीं यौगन्धरयण की प्रतिज्ञा विफल नहीं हो जाय। पर राजा स्वप्न में बड़बड़ाता है तो वासवदत्ता को तसल्ली हो जाती है कि राजा सो रहे हैं। मैं थोड़ी देर यहाँ रुक सकती हूँ और अपने हृदय को परितोष दे सकती हूँ। राजा स्वप्न में ही कहते हैं कि "हे प्रिये, मेरी बात सन रही हो तो उत्तर दो।" वासवदत्ता विहल होकर कहती है- "मैं बोल रही हूँ, मैं बोल रही हूँ"। राजा के मुँह से निकलता है-“नाराज हो" । वासवदत्ता-'नहीं नहीं' मैं दुःखी हूँ। “वासवदत्ता, यदि नाराज नहीं हो तो तुमने गहने क्यों उतार दिए"। यही प्रलाप का उत्तर चलता ही रहता है कि वासवदत्ता सोचती है कि जब तक कोई नहीं आता, तब तक मैं खिसक जाऊँ। आर्यपुत्र का हाथ जो शय्या से नीचे लटक रहा है, शय्या पर पुनः रखकर खिसक जाऊँ। इतने में राजा उठ जाते हैं और बोलते हैं. "वासवदत्ता, ठहरो, ठहरो। मैं उठा और घबड़ाहट में दरवाजे से टकरा गया। इसलिए नहीं जान पाया कि मेरी आकांक्षा का मूल रूप वासवदत्ता ही मिली थी या नहीं"। यह पूरा प्रसंग स्वप्नवासवदत्ता नाम को सार्थक करता है और राजा (उदयन) के भीतर के गहरे द्वन्द्व को रेखांकित करता है। पद्मावती से उसका विवाह राजनैतिक उद्देश्य से रचाया गया है।

About the writer

VIDYANIWAS MISHRA

VIDYANIWAS MISHRA पं. विद्यानिवास मिश्र (1926-2005) हिन्दी और संस्कृत के अग्रणी विद्वान, प्रख्यात निबंधकार, भाषाविद् और चिन्तक थे। आपका जन्म गोरखपुर जिले के ‘पकड़डीहा’ ग्राम में हुआ। प्रारम्भ में सरकारी पदों पर रहे। तत्पश्चात् गोरखपुर विश्वविद्यालय, आगरा विश्वविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ और फिर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, आचार्य, निदेशक, अतिथि आचार्य और कुलपति के पदों को सुशोभित किया। कैलिफोर्निया और वाशिंगटन विश्वविद्यालयों में अतिथि प्रोफेसर एवं ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान सम्पादक भी रहे। अपनी साहित्यिक सेवाओं के लिए आप भारतीय ज्ञानपीठ के ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’, के.के. बिड़ला फाउंडेशन के ‘शंकर सम्मान’, उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी के सर्वोच्च ‘विश्व भारती सम्मान’, भारत सरकार के ‘पद्मश्री’ और ‘पद्मभूषण’, ‘भारत भारती सम्मान’, ‘महाराष्ट्र भारती सम्मान’, ‘हेडगेवार प्रज्ञा पुरस्कार’, साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान ‘महत्तर सदस्यता’, हिन्दी साहित्य सम्मेलन से ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ तथा उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी से ‘रत्न सदस्यता सम्मान’ से सम्मानित किये गये और राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। बड़ी संख्या में प्रकाशित आपकी पुस्तकों में व्यक्ति-व्यंजक निबन्ध संग्रह, आलोचनात्मक तथा विवेचनात्मक कृतियाँ, भाषा-चिन्तन के क्षेत्रा में शोधग्रन्थ और कविता संकलन सम्मिलित हैं।

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