Sanskritee Kee Uttarkatha

Format:Hard Bound

ISBN:978-81-70556-72-5

Author:SHAMBUNATH

Pages:232


MRP : Rs. 395/-

Stock:In Stock

Rs. 395/-

Details

संस्कृति की उत्तरकथा

Additional Information

क्या नवजागरण की तरह नया आर्थिक सुधार या उदारीकरण भी समाज में 'मूल्य' और 'सृजन' के स्तर पर कोई सांस्कृतिक उत्थान ला पा रहा है? आधुनिकता की महान परियोजनाएँ क्या थीं और ये क्यों पिछड़ गयीं। आधुनिकता के आखिरी साहित्यिक संघर्ष की व्याख्या करते हुए शंभुनाथ अपनी आलोचना पुस्तक संस्कृति की उत्तरकथा में एक ओर, उत्तर-आधुनिकतावाद, उपभोक्तावाद, झुंड संस्कृति और बड़े संचार माध्यम द्वारा उपस्थित गम्भीर चुनौतियों को स्पष्ट करते हैं, दूसरी ओर, तीसरी सहस्राब्दि के लिए एक ऐसे सांस्कृतिक विजन की खोज भी, जो विज्ञान, टेक्नोलॉजी और मक्त बाजार द्वारा ढाले जा रहे समाज में मनुष्यता के अस्तित्व के लिए जरूरी है। यह पुस्तक पश्चिमीकरण और कट्टरता दोनों से टकराते हुए, यथार्थपरक भारतीय विकल्पों की खोज की जरूरत का गहरा बौद्धिक अहसास कराती है। मनुष्य की तर्क और आलोचना शक्ति जब झुंड संस्कृति की विस्तृत चपेट में है, शंभुनाथ ने हिन्दी आलोचना के दायरे को बढ़ाते हुए संस्कृति की उत्तरकथा में साहित्य, संस्कृति और सामाजिक प्रश्न के बीच की दीवारों को तोड़ा है। पुस्तक विपर्यय की। उन प्रक्रियाओं का उद्घाटन करती है, जिनमें 'मूल्य' छल में, 'तर्क' उन्माद में और 'सृजन' मनोरंजन में। बदल रहा है। निराला युग के आदर्शों के विघटन की विस्तृत संस्कृति-समीक्षा में उतरते हुए, पुनर्निर्माण की सम्भावनाओं पर चर्चा इस आलोचना पुस्तक का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू है। संस्कृति से उठाये गये युद्धास्त्रों का जवाब संस्कृति के भीतर से देने वाली एक पठनीय आलोचना पुस्तक-संस्कृति की उत्तरकथा!

About the writer

SHAMBUNATH

SHAMBUNATH हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक। हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय में 1979 से 2014 तक अध्यापन। 2006-08 के बीच केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के निदेशक पद पर रहते हुए देश और विदेश में हिंदी के लिए विपुल कार्य। प्रमुख पुस्तकें: संस्कृति की उत्तरकथा (2000), धर्म का दुखांत (2000), दुस्समय में साहित्य (2002), हिंदी नवजागरण और संस्कृति (2004), सभ्यता से संवाद (2008), रामविलास शर्मा (2011), भारतीय अस्मिता और हिंदी (2012), कवि की नई दुनिया (2012), राष्ट्रीय पुनर्जागरण और रामविलास शर्मा (2013), उपनिवेशवाद और हिंदी आलोचना (2014), प्रेमचंद का हिंदुस्तान: साम्राज्य से राष्ट्र (2014)। प्रमुख संपादन: जातिवाद और रंगभेद (1990), गणेश शंकर विद्यार्थी और हिंदी पत्राकारिता (1991), राहुल सांकृत्यायन (1993), आधुनिकता की पुनर्व्याख्या (2000), रामचंद्र शुक्ल के लेखों का बांग्ला अनुवाद ‘संचयन’ (1998), सामाजिक क्रांति के दस्तावेजश् (दो खंड, 2004), 1857, नवजागरण और भारतीय भाषाएँ (2007), भारतेंदु और भारतीय नवजागरण (2009), संस्कृति का प्रश्न: एशियाई परिदृश्य (2011), हिंदी पत्राकारिता: हमारी विरासत (दो खंड, 2012), शब्द का संसार (2012), प्रसाद और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन (2013)।

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