Sabhyata Se Samvad

Format:Hard Bound

ISBN:978-81-7055-849-2

Author:SHAMBUNATH

Pages:222


MRP : Rs. 300/-

Stock:In Stock

Rs. 300/-

Details

सभ्यता से संवाद

Additional Information

सभ्यताएँ अक्सर जीवन सौन्दर्य रचने का दावा ले कर आती हैं, पर किस तरह वे नेपथ्य में औपनिवेशिक और धार्मिक आखेट करती हैं, क्यों सच्ची सभ्यताएँ वस्तुतः टकराती नहीं, बल्कि संवाद करती हैं, सभ्यताओं की लीला-भूमि भारत में एक बार फिर किस तरह सभ्यता और बर्बरता का फ़र्क मिट रहा है, 'असहमति' और 'प्रतिरोध' की दीर्घ भारतीय परम्परा भी किस तरह बची हुई है – 'सभ्यता से संवाद' में एक नयी ज़मीन पर इन प्रश्नों का सामना करने के क्रम में शंभुनाथ भारत को फिर से खोजते हुए, सभ्यता-विमर्श को एक नया आयाम देते हैं। 'सभ्यता से संवाद' में बीसवीं सदी की वैचारिक उथल-पुथल के दृश्य हैं। इसमें पश्चिमी और भारतीय सभ्यताओं से हमारे रिश्तों की पुनर्व्याख्या है। वैश्वीकरण के युग में बाज़ारवाद और सामुदायिक कट्टरवाद की संस्कृतियाँ किस तरह न केवल जनतत्र, बल्कि राष्ट्रीयता, मानवतावाद और आज़ादी की भी धारणाओं को संकुचित कर रही हैं, 20वीं सदी के पूर्वार्ध में ऐतिहासिक सीमान्त की आवाज़ों के बीच किस तरह 'राष्ट्र' की अनोखी मानवीय धारणा उभर रही थी, आधुनिकता ने क्या दिया, भविष्य के भय क्या हैं - 'सभ्यता से संवाद' में इन सबका पारदर्शी आलोचनात्मक आकलन है। आलोचना की नयी भाषा गढ़ने वाले शंभुनाथ ने इस पुस्तक में अपने समय के सभ्यतागत प्रश्नों से जूझते हुए सच्ची भारतीय बेचैनियों को पहचाना है और सभ्यता ही नहीं, साहित्य की भी एक वैकल्पिक समझ दी है। एक रोचक, तथ्यपरक और आत्मीय लगने वाली। आलोचना पुस्तक!

About the writer

SHAMBUNATH

SHAMBUNATH हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक। हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय में 1979 से 2014 तक अध्यापन। 2006-08 के बीच केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के निदेशक पद पर रहते हुए देश और विदेश में हिंदी के लिए विपुल कार्य। प्रमुख पुस्तकें: संस्कृति की उत्तरकथा (2000), धर्म का दुखांत (2000), दुस्समय में साहित्य (2002), हिंदी नवजागरण और संस्कृति (2004), सभ्यता से संवाद (2008), रामविलास शर्मा (2011), भारतीय अस्मिता और हिंदी (2012), कवि की नई दुनिया (2012), राष्ट्रीय पुनर्जागरण और रामविलास शर्मा (2013), उपनिवेशवाद और हिंदी आलोचना (2014), प्रेमचंद का हिंदुस्तान: साम्राज्य से राष्ट्र (2014)। प्रमुख संपादन: जातिवाद और रंगभेद (1990), गणेश शंकर विद्यार्थी और हिंदी पत्राकारिता (1991), राहुल सांकृत्यायन (1993), आधुनिकता की पुनर्व्याख्या (2000), रामचंद्र शुक्ल के लेखों का बांग्ला अनुवाद ‘संचयन’ (1998), सामाजिक क्रांति के दस्तावेजश् (दो खंड, 2004), 1857, नवजागरण और भारतीय भाषाएँ (2007), भारतेंदु और भारतीय नवजागरण (2009), संस्कृति का प्रश्न: एशियाई परिदृश्य (2011), हिंदी पत्राकारिता: हमारी विरासत (दो खंड, 2012), शब्द का संसार (2012), प्रसाद और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन (2013)।

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