Anteryatra

Format:Hard Bound

ISBN:978-81-8143-365-7

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Pages:105


MRP : Rs. 150/-

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अन्तरर्यात्रा

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मनुष्य की नियति और उसके संघर्ष, जीवन के प्रति अदम्य लालसा और उससे उपजे मोहभंग, अन्धेरे में भी संघर्ष की आंच में तपते हुए प्रकाश को टटोलने और उसके सहारे जीवन की यात्रा को देखने परखने का दस्तावेज़ है - ‘अन्तर्यात्रा'। आमिल जैसे रचनाकार का एक ओर जन की आकाँक्षा को सहेजने का यत्न और दूसरी ओर अपने भाव जगत के भीतर प्रवेश करके सारे धूल-धक्कड़, कलुष, द्वेष और द्वन्द्वको त्यागने के संगुम्फन से बना यह उपन्यास कहीं बड़े गहरे हमें मनुष्य बने रहने का बोध कराता है। एक आम आदमी का जीवन किस तरह अपने अन्दर कल्पनातीत ढंग से बेहतर मानवीय मूल्यों को सिरजते हुए बड़े आदमी का जीवन बन जाता है, ऐसे बारीक रेशों की पड़ताल यह कृति करती है। इस मामले में गाँव - जवार से बाहर निकल कर अध्यात्म और परम्परा के सूक्ष्म विश्लेषण में यह रचना अपना स्वयं का अध्यात्म पुनसृजित करती है। कहना न होगा अपनी अन्य दो औपन्यासिक कृतियों क्रमशः 'सीमाएं' एवं 'गोधूलि' की तरह एक बार फिर आमिल इसमें मनुष्यता और सौजन्य का एक बड़ा आकाश रचते हैं। अन्तर्यात्रा ऐसे ही छोटे-छोटे जीवन के पड़ावों से गुजरते हुए अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करती है और समय के बाहर एक नये अर्थ भरे समय की सम्भावना रचती है।

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