Pannon Par Kuch Din

Format:Hard Bound

ISBN:978-93-9067-843-3

Author:Namwar Singh, Edited by Vijay Prakash Singh

Pages:152


MRP : Rs. 399/-

Stock:In Stock

Rs. 399/-

Details

पन्नों पर कुछ दिन

Additional Information

इन दो अलग-अलग कालखण्डों की डायरी से गुज़रने पर ऐसा लगता है कि यह विद्यार्थी नामवर सिंह से शोधार्थी नामवर सिंह की यात्रा का एक संक्षिप्त साहित्यिक वृत्तान्त है। उनके एकान्त के क्षणों का चिन्तन, अपने मित्रों, गुरुओं तथा उस समय के उभरते हुए साहित्यकारों के साथ बौद्धिक-विमर्शसब कुछ इन दोनों डायरियों में दर्ज है। इन डायरियों को उस समय के साहित्यिक वातावरण का दर्पण भी कहा जा सकता है। बनारस और इलाहाबाद उस समय साहित्य, संगीत और कला की उर्वर भूमि थे। साहित्य की बहुत-सी प्रसिद्ध हस्तियाँ इन शहरों की देन थीं, जिनका इन शहरों से लगाव भी बराबर बना रहा। इन शहरों के उस कालखण्ड पर नज़र डालें, तो मशहूर ग्रीक कवि कवाफ़ी का यह वाक्य याद आता है- “हम किसी शहर में नहीं, समय विशेष में रहते हैं और समय?' ये शहर तो आज भी हैं, लेकिन वह समय, वे लोग, वह वातावरण अब पहले की तरह नहीं हैं। नामवर सिंह को बेहतर जानने और समझने की जिज्ञासा रखने वालों के लिए पन्नों पर कुछ दिन पुस्तक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ हो सकती है।

About the writer

Namwar Singh, Edited by Vijay Prakash Singh

Namwar Singh, Edited by Vijay Prakash Singh नामवर सिंह जन्म-तिथि : 28 जुलाई, 1926 । जन्म-स्थान : बनारस जिले का जीयनपुर नामक गाँव । प्राथमिक शिक्षा बगल के गाँव आवाजापुर में। कमालपुर से मिडिल। बनारस के हीवेट क्षत्रिय स्कूल से मैट्रिक और उदय प्रताप कॉलेज से इंटरमीडिएट। 1941 में कविता से लेखक जीवन की शुरुआत । पहली कविता इसी साल 'क्षत्रियमित्र' पत्रिका (बनारस) में प्रकाशित। 1949 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.ए. और 1951 में वहीं से हिन्दी में एम. ए.। 1953 में उसी विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में अस्थायी पद पर नियुक्ति। 1956 में पीएच.डी. ('पृथ्वीराज रासो की भाषा')। 1959 में चकिया चन्दौली के लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार। चुनाव में असफलता के साथ विश्वविद्यालय से मुक्त। 1959-60 में सागर विश्वविद्यालय (म.प्र.) के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर। 1960 से 1965 तक बनारस में रहकर स्वतन्त्र लेखन। 1965 में 'जनयुग' साप्ताहिक के सम्पादक के रूप में दिल्ली में। इस दौरान दो वर्षों तक राजकमल प्रकाशन (दिल्ली) के साहित्यिक सलाहकार। 1967 से 'आलोचना' त्रैमासिक का सम्पादन। 1970 में जोधपुर विश्वविद्यालय (राजस्थान) के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर प्रोफ़ेसर के रूप में नियुक्त। 1971 में 'कविता के नये प्रतिमान' पर साहित्य अकादेमी का पुरस्कार। 1974 में थोड़े समय के लिए क.मा.मुं. हिन्दी विद्यापीठ, आगरा के निदेशक। उसी वर्ष जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (दिल्ली) के भारतीय भाषा केन्द्र में हिन्दी के प्रोफ़ेसर के रूप में योगदान। 1987 में वहीं से सेवा-मुक्त। अगले पाँच वर्षों के लिए वहीं पुनर्नियुक्ति। वहीं प्रोफ़ेसर एमेरिटस रहे। 1993 से 1996 तक राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फ़ाउंडेशन के अध्यक्ष। आठ वर्ष तक महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलाधिपति भी रहे। 1967 से 'आलोचना' त्रैमासिक के प्रधान सम्पादक रहे। निधन : 19 फ़रवरी, 2019 ।। / विजय प्रकाश सिंह 1 नवम्बर, 1949 को तत्कालीन बनारस ज़िले के जीयनपुर गाँव में जन्म। हाईस्कूल तक की पढ़ाई जीयनपुर के पास शहीद गाँव से। बी.एससी. उदय प्रताप कॉलेज, वाराणसी से । एम.टेक. इंजीनियरिंग, मास्को, तत्कालीन सोवियत संघ से। 33 वर्ष तक भारत सरकार के कई उपक्रमों में सेवारत रहे। भारत सरकार के अन्तिम उपक्रम एयर इंडिया से एक दशक पहले से सेवामुक्त। सम्प्रति : पढ़ने-लिखने में रुचि। स्व. पिता नामवर सिंह के बिखरे-निखरे, आख्यानों, आलेखों, अप्रकाशित सामग्री के संकलन-प्रकाशन में कार्यरत। सम्पर्क : सी-484, पहली मंज़िल, चितरंजन पार्क, नयी दिल्ली-110019 मोबाइल : 9891357848

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